'यह जो शहर है गोरखपुर'- हरिओम
(योगी आदित्यनाथ का यह बयान निहायत बेहूदा और अतार्किक है कि 'जो लोग सूर्य नमस्कार को नहीं मानते, उन्हें समुद्र में डूब जाना चाहिए।' लोकसभा चुनाव के समय से ही देश भर में रह रही तरक्कीपसंद आवाम और मुसलमानो के लिए 'देश छोडकर चले जाना चाहिए' जैसी धमकियाँ आम हो गई हैं। मानो देश न हो , बाबू साहब का चौखटा हो जिसे छोड़ने की धमकी बाऊ साहब जब जिसे चाहें दे सकते है। योग को धर्म से जोड़कर जो गंदी राजनीति इस देश में की जा रही है उसका पूरजोर विरोध करना चाहिए। मेहनतकश गरीब जनता का सांप्रदायीकरण इस पूरे घटनाक्रम की केंद्रीय कुंजी है। योगी ने तो पूरे पूर्वाञ्चंचल को सांप्रदायिक प्रयोगों की पाठशाला बना रखा है, विश्वास नहीं होता कि यह उसी गोरखनाथ के पीठ का उत्तराधिकरी है जिन्होंने कभी तमाम तरह की शास्त्रीय रूढ़ियों और कठमुललेपन को बौद्धिक चुनौती दी थी । भारत जैसे देश में किसी को किसी की धार्मिक भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है। गोरखपुर रामप्रसाद बिस्मिल, प्रेमचंद और फ़िराक गोरखपुरी की धरती है, वहाँ पर फिरकापरस्ती का धंधा बंद होना चाहिए। लीजिये पढिए कवि-कथाकार हरिओम की कविता 'यह जो शहर है गोरखपुर'। यह कविता उन्होंने गोरखपुर का जिलाधिकारी रहते हुए लिखी थी।)
'यह जो शहर है गोरखपुर'- हरिओम
ये जो शहर था बिस्मिल का
ये वह शहर तो नहींजिसके सिरहाने
कभी बजा था कोई बिगुल
और चौंक कर
उठा था इतिहास
ये वह जमीं तो नहीं
जिसकी मिट्टी अपनी सूखी त्वचा
पर मल कभी खेत मजदूरों ने
ठोंकी थी ताल और
आकाश के छाती से उतर
भागे थे फिरंग
ये धुआंती हवा
नहीं देती पता उस अमोघ वन का
जिसने किसी राजा के आँखों में
छोड़ा था आजादी का हरा भरा स्वप्न
और जिसने बसाई थी
जुगनुओं की एक राजधानी सुंदर
इस शहर के सीवान में
अब कैसे ढूँढे वह वृक्ष
जिसके नीचे
शताब्दियों बैठे रहे गोरख
और रचते रहे
अज्ञान और पाखंड के
नाश का अघोर पंथ
नहीं दिखती
चिटखी मीनारों वाली ईदगाह में
वो नन्ही चहक
जहां साहित्य के किसी मुंशी ने
हामिद के हाथों में सौपा था
दादी का चिमटा
अब जबकि
किसी शहर से छीन ली गई हो
उसकी विरासत
परंपरा के पहिये को मोड़
उलट दी गई हो उसकी गति
कैसे मिल सकेंगे फिर
राहत, देवेन्द्रनाथ
धरीक्षण,मोती और फिराक
नदियों की गोद में खेलता एक शहर
जिसके माथे पर मचलती रहे
उमगते चाँद की ठंडाक
और जो तब भी
बूढ़ा होने से पहले हो जाए बंजर
एक शहर
लोग कहते हैं
जिसका अक्स कभी
झील में चमकते परीलोक-सा
लगता था
एक शहर जिसके
सुर्ख चेहरे पर चढ़ा हो पीला लेप
जिसके जिस्म से गुजरते हों
उन्माद के ज्वार अक्सर
जहां आदिम मुद्दों
पर चलती हो बहसें
दिन-रात
ठेका-पट्टों और लाईसेंसों की
बिसात पर नाचती हो सियासत
एक शहर
जहाँ पलते हों विराट राष्ट्र के
सैन्य स्वप्न और
टाउन से उपस्थित हो गाउन
ये वो शहर तो नहीं
जिसके बारे में
उजली हंसी के छोर पर बैठ
आधी सदी से
सोच रहे हो परमानंद
या जहां कॉमरेड जीता कौर ने
रामगढ़ ताल के किनारे
माथे पर साफा बांध
छोटी जमीन वाले किसानों
और बुझी आँखों वाली
स्त्रियॉं के मन में
जगाया था संघर्ष और जीत का जज्बा
ये वो शहर है
जहां से आरंभ होगा
हमारी सदी का शास्त्रार्थ
जिसमें भाग लेंगे नीमार,गजोधर, रुक्मा और भरोस
और कछारों के वे किसान
जिनके खेतों में उगती
रही है भूख
वे जुलाहे जिन्होंने
चरखों की खराद पर काटी हैं
अपनी उंगलिया
वे मजदूर जो
ठंडे पड़ गए कारखानों की
चिमनियों से लिपट पुश्तों से कर रहे
अपनी बारी का इंतजार
इस शास्त्रार्थ में
उतरेंगी वे लड़किया भी
जो दादी नानी के जमाने से
जवान होने की ललक में
हो जाती हैं बूढ़ी
और पूछेंगी
अपने जीवन का पहला प्रश्न
और स्वयं ही देंगी
उसका जवाब
हमारी सदी के
इस अद्भुत विमर्श
को सुनेंगे
योग भोग के पुरोधा
पांडे और पुरोहित
मौलवी और उलेमा
हाकिम-हुक्काम
सेठ-साहूकार
मंत्री और ठेकेदार
इस शास्त्रार्थ में
नहीं होंगे वे विषय
जिन्हें पाषाण काल से पढ़ाते रहे
परमपूज्य गुरुवर
और न ही होंगे वे
मसाइल
जिनके समाधान में
मालामाल होते रहे मुंसफ और वकील
हमारी सभ्यता के
इस उत्तर-आधुनिक समय में
पूछे जाएँगे
संस्कृति के आदिम प्रश्न
कि पंचो के राज में
भूख से क्यों मारता है बिकाऊ ?
कि मछुआरों के खेल में
कैसे सूखते हैं ताल?
कि इतने भाषणों के बावजूद
दरअसल क्यूँ मर जाती है भाषा?
कि इस शहर में प्रेम करना क्यूँ है इतना मुश्किल ?
या फिर
सिर्फ यही
कि ये जो शहर है गोरखपुर
ये वह शहर क्यूँ नहीं?
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