शुक्रवार, 12 जून 2015

भगत सिंह की शहादत और भगवा राजनीति का सच

अभी 14 फरवरी को जब बजरंगदली गुंडे प्रेम करने वाले युवक वुवतियों को देश भर में पीट रहे थे, ठीक उसी दिन सोशल मीडिया पर भगत सिंह के बहाने राष्ट्रभक्ति का राग छेड़े हुए थे। वे यह प्रचारित कर रहे थे कि जिस दिन (14 फरवरी) भगत सिंह की शहादत हुई उस दिन को प्रेम दिवस (वैलेंटाइन डे) कैसे मनाया जा सकता है। यह जानते हुए भी कि 14 फरवरी से भगत सिंह का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं, संघी लफंगई पूरे शबाब पर थी।  यह कैसे राष्ट्र भक्त हैं जो शहीदेआजम की शहादत का दिन भी नहीं जानते? कितनी खोखली है उनकी राष्ट्र भक्ति और कितना झूठा है उनका इतिहास और सामान्य ज्ञान। भगत सिंह के नाम पर प्रेमी जोड़ो की दुर्दशा करने वाले दर असल प्रेम विरोध के अपने कृत्य को भगत सिंह की आड़ में छिपा ले जाना चाहते थे। पर उनकी साजिश को इस देश का युवा मन समझता है। वह व्यक्ति जो क्रान्ति में मदद करने वाली हर चीज से बेपनाह मुहब्बत करता हो और जो तरुणाई को क्रान्ति और प्रेम का दर्शन सिखाता हो उसके नाम पर प्रेम विरोध का कृत्य अत्यंत शर्मनाक है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। प्रेम और देश भक्ति में भगत सिंह कोई अंतर्विरोध ऐसे भी नहीं देखते थे। मतवाला पत्रिका में छपे अपने एक लेख युवक में देश के नवयुवकों के बारे में उन्होने लिखा है कि –युवक ही स्वदेश की विजय- वैजयंती का सुदृढ़-दंड है। वह महासागर की उत्ताल तरंगों के समान उद्दंड है। वह महाभारत के भीष्म पर्व की पहली ललकार के समान विकराल है, प्रथम मिलन के स्फीत चुंबन की तरह सरस है।.....याद आती हैं पाश की पंक्तियाँ-प्यार करना/और लड़ सकना/जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है/धूप की तरह धरती पर खिल जाना/और फिर आलिंगन में सिमट जाना/बारूद की तरह भड़क उठना/और चारों दिशाओं में गूंज जाना-/जीने का यही सलीका होता है/प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा/जिन्हें जिन्दगी ने बनिए बना दिया/जिस्म का रिश्ता समझ सकना,/खुशी और नफरत में कभी भी लकीर न खींचना,/जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना,/सहम को चीरकर मिलना और विदा होना,/बड़ी शूरवीरता का काम होता है मेरी दोस्त,
केंद्र में भाजपाई नेतृत्त्व में बनी नई सरकार के मुखिया के के इतिहास ज्ञान से प्रेरित राष्ट्र भक्तों से यही कहा जा सकता है कि गांधी, पटेल की तरह भगत सिंह का इस्तेमाल आपके लिए बहुत घाटे का सौदा होगा। वे अपने दृष्टिकोण में इतने साफ और वैज्ञानिक हैं कि अपना वैचारिक इस्तेमाल करने के छूट नहीं देते। अगर आप राष्ट्र भक्ति और विश्वबन्धुत्त्व के कारण उनकी तरफ आकर्षित है तो एक नजर उनके विचारो की धार पर भी देना चाहिए। 1924 में प्रकाशित अपने लेख विश्वबन्धुत्त्व को परिभाषित करते हुए उन्होने लिखा कि-विश्वबन्धुता !इसका अर्थ मैं  तो संसार में समानता (साम्यवाद, world wide equality in the true sense)के अतिरिक्त कुछ नहीं समझता । और साम्यवाद भगत सिंह के लिए कोई फैशन नहीं था बल्कि  सच्चे अर्थों में वह अंतरराष्ट्रीयता वाद से प्रेरित था। बात-बात पर विश्वबंधुत्व के लिए चिल्ल-पों मचाने वालों से अलग विश्व बंधुत्त्व का एक काल्पनिक खाका उनके पास बिलकुल साफ तौर पर सुरक्षित था। वे कहते थे कि –‘ उस दिन इतनी शक्ति होगी कि शांति-शांति की पुकार भी शांति भंग न कर सकेगी। उस दिन भूख लगने पर रोटी के लिए किसी को भी चिल्ल-पों मचाने की आवश्यकता नहीं  हुआ करेगी। व्यापार उस दिन उन्नति के शिखर पर होगा, परंतु फ्रांस और जर्मनी में व्यापार के नाम पर घोर युद्ध न हुआ करेंगे। उस दिन अमेरिका और जापान दोनों होंगे, परंतु उनमें पूर्वी और पश्चिमीपन नहीं होगा.... अंग्रेज़ भी होंगे और भारतवासी भी परन्तु उस समय उनामे गुलाम और शासक का भाव न होगा। उस दिन महात्मा तालस्टाय के ‘resist not the avil’ (बुराईयों का प्रतिकार मत करो) वाले सिद्धान्त की उच्च ध्वनि न लगने पर भी संसार में बुराईयाँ नजर न आएंगी। उस समय होगी पूर्ण स्वतन्त्रता । कैसा होगा वह समय? जरा कल्पना करो। पर अफसोस कि कल्पना और विजन के बदले आजकल झूठ से काम चलाया जा रहा है।  
और आपकी राजनीति जिस धर्म की बुनियाद पर खड़ी है  और घृणा तथा सांप्रदायिकता के सहारे फलती फूलती है, उसका भगत सिंह के सपनों के भारत में कोई स्थान नहीं है। बहुत उदार और लोकतान्त्रिक बुद्धिजीवियों में भी भारत जैसे देश में धर्म को व्यक्तिगत रुचि का मामला माना जाता है। किन्तु अक्सर देखा यह  जाता है  कि व्यक्तिगत आस्था के नाम पर धर्म के भीतर से ही भेदभाव, परस्पर घृणा, कर्मकांड आदि की गुंजाईश निकाल ली जाती है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में भी धर्म की भूमिका को लेकर बहसें थीं। उन बहसों में एक पक्ष भगत सिंह का भी था। वे धर्म को व्यक्तिगत या पारिवारिक मानकर छोड़ दिये जाने के पक्ष में कदापि न थे-बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतन्त्रता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गुलामी का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है-बच्चे को हमेशा के लिए कमजोर बनाना है। उसके दिल की ताकत और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो भी हमें नजर आता है कि धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक से हो। उनमें पूंजी-पतियों के ऊंच-नीच की, छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पंडित, मौलवी जी जैसे लोग भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को जनेऊ तक देने से इंकारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की कसम ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिए, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराईयों का सुधार किया जाए। बहुत खूब ! छूत-अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाए। भेदभाव तो फिर भी रहा ही। किसी समाज में सामंती संरचना को बचाए रखने के लिए धर्म की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। जाहिर है  सामाजिक प्रगति का रास्ता बिना उस धार्मिक संरचना से मुठभेड़ किए नहीं बनाया जा सकता। तार्किकता का विकास और सच्चाई का निर्मम सामना करते हुए आलोचनात्मक चेतना का निर्माण इसका एक रास्ता हो सकता था। भगत सिंह धर्म की नब्ज को जहां से पकड़ रहे थे,वह बीसवीं ही नहीं इक्कीसवी सदी का भी सच है। पूँजीवाद से धर्म का गँठजोड़ इतने बुरे रूप में कभी सामने नहीं आया था। जिस देश में दलित मुख्यमंत्री तक के मंदिर में जाने के बाद पूरे मंदिर को धुलवाया जा रहा हो, जांच करने गए अधिकारियों को पीटा जा रहा हो उस देश में दलितो और गरीबों पर किस तरह के जुर्म धर्म की आँड में ढाए जाते होंगे, उसका अंदाजा लगानना बहुत मुश्किल है। भगत सिंह के दिखाए रास्ते पर चलने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा इस दौर में जरूरी है। पर अफसोस उसका रास्ता अंधश्रद्धा और धार्मिक कट्टरपन से होकर नहीं गुजरता । भगत सिंह यहाँ भी आपके काम के न ठहरेंगे।
जो लोग विकास का संबध अंबानी/अडानी के लाभ और  सांप्रदायिक दंगे के विकास से लगाते हो, उन्हें सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज शीर्षक लेख जरूर पढ़ना चाहिए। दंगों  के पीछे निहित धार्मिक भावनाएं , राजनतिक नेतृत्त्व की मंशा,बिके हुए मीडिया का कमाल सब पर भगत सिंह की नजर जाती है। तिलक, गोखले जिनसे कभी राजनीति सीखी, उनके दृष्टिकोण में सांप्रदायिक रुझान देख निर्मम आलोचना का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे।  मेरे एक मित्र ने बताया कि भगत सिंह ने लाजपत राय पर एक पैम्फलेट निकाला था जिसका लब्बो-लुआब यह था कि उसने चंद चांदी के सिक्कों की खातिर हमें बेच दिया। उसी लेख में भगत सिंह बताते हैं कि सांप्रदायिक दंगों की जड़ खोदे तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। ...बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है। भगत सिंह सांप्रदायिक दंगों के पीछे के अर्थशास्त्र को देख पा रहे थे इसीलिए उन्होने प्रस्तावित किया कि- लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्गचेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को यह स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं,इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति,रंग,धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारे भलाई इसी में है कि तुम धर्म,रंग, नस्ल, और राष्ट्रीयता व भेदभाव मिटाकर एक जुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नो में तुम्हारा नुकसान कुछ न होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरे कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।पूजीपतियों के खिलाफ जनता की गोलबंदी का स्वप्न वही देख सकता है जिसे देश से सचमुच का और सच्चा प्यार है। वह नहीं जो जनता को जनधन के नाम पर छले और पूजीपतियों की गोद में खेले। जनता की जमीन छीनकर उपहार देने के लिए अधिनियम पास कराए।
राष्ट्रप्रेम और त्याग की एक मात्र कसौटी यही हो सकती है कि वह निस्वार्थ हो और निश्चित उद्देश्यों के पूर्ति के लिए किया जा रहा हो। भगत सिंह से यह भी सीखा जा सकता है कि कैसे अपने मूल्यों और आदर्शो के लिए आत्मोत्सर्ग किया जा सकता है। जिन लोगों  को सत्ता के लिए हर आदर्श और मूल्य की कुर्बानी सबसे प्रीतिकर लगती हो उनका रास्ता भगत सिंह से मेल नहीं खाता। भगत सिंह ने फासी की सजा से माफी के लिए कोई अर्जी नहीं दी थी। बल्कि अपने पिता को लिखे एक पत्र में तो इस सदर्भ में पिता जी द्वारा की गई पहल पर ऐतराज जताते हुए लिखा कि-यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके विषय में बस इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है-निचल स्तर की कमजोरी। अंग्रेज़ो से माफी मांगने के एवज में भारत रत्न देने वालों से एक सवाल तो बनाता ही है कि आप भगत सिंह के वारिस कैसे हो गए?  

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