शुक्रवार, 12 जून 2015


'यह जो शहर है गोरखपुर'- हरिओम


(योगी आदित्यनाथ का यह बयान निहायत बेहूदा और अतार्किक है कि 'जो लोग सूर्य नमस्कार को नहीं मानते, उन्हें समुद्र में डूब जाना चाहिए।' लोकसभा चुनाव के समय से ही देश भर में रह रही तरक्कीपसंद आवाम और मुसलमानो के लिए 'देश छोडकर चले जाना चाहिए' जैसी धमकियाँ  आम हो गई हैं। मानो देश न हो , बाबू साहब का चौखटा हो जिसे छोड़ने की धमकी बाऊ साहब जब जिसे चाहें दे सकते है। योग को धर्म से जोड़कर जो गंदी राजनीति इस देश में की जा रही है उसका पूरजोर विरोध करना चाहिए। मेहनतकश गरीब जनता का सांप्रदायीकरण इस पूरे घटनाक्रम की केंद्रीय कुंजी है। योगी ने तो पूरे पूर्वाञ्चंचल को सांप्रदायिक प्रयोगों की पाठशाला बना रखा है, विश्वास नहीं होता कि यह उसी गोरखनाथ के पीठ का उत्तराधिकरी है जिन्होंने कभी तमाम तरह की शास्त्रीय रूढ़ियों और कठमुललेपन को बौद्धिक चुनौती दी थी । भारत जैसे देश में किसी को किसी की धार्मिक भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है। गोरखपुर रामप्रसाद बिस्मिल, प्रेमचंद और फ़िराक गोरखपुरी की धरती है, वहाँ पर फिरकापरस्ती का धंधा बंद होना चाहिए। लीजिये पढिए कवि-कथाकार हरिओम की कविता 'यह जो शहर है गोरखपुर'। यह कविता उन्होंने गोरखपुर का जिलाधिकारी रहते हुए लिखी थी।)

'यह जो शहर है गोरखपुर'- हरिओम

ये जो शहर था बिस्मिल का
ये वह शहर तो नहीं
जिसके सिरहाने
कभी बजा था कोई बिगुल
और चौंक कर
उठा था इतिहास
ये वह जमीं तो नहीं
जिसकी मिट्टी अपनी सूखी त्वचा
पर मल कभी खेत मजदूरों ने
ठोंकी थी ताल और
आकाश के छाती से उतर
भागे थे फिरंग

ये धुआंती हवा
नहीं देती पता उस अमोघ वन का
जिसने किसी राजा के आँखों में
छोड़ा था आजादी का हरा भरा स्वप्न
और जिसने बसाई थी
जुगनुओं की एक राजधानी सुंदर
इस शहर के सीवान में
अब कैसे ढूँढे वह वृक्ष
जिसके नीचे
शताब्दियों बैठे रहे गोरख
और रचते रहे
अज्ञान और पाखंड के
नाश का अघोर पंथ

नहीं दिखती
चिटखी मीनारों वाली ईदगाह में
वो नन्ही चहक
जहां साहित्य के किसी मुंशी ने
हामिद के हाथों में सौपा था
दादी का चिमटा

अब जबकि
किसी शहर से छीन ली गई हो
उसकी विरासत
परंपरा के पहिये को मोड़
उलट दी गई हो उसकी गति
कैसे मिल सकेंगे फिर
राहत, देवेन्द्रनाथ
धरीक्षण,मोती और फिराक

नदियों की गोद में खेलता एक शहर
जिसके माथे पर मचलती रहे
उमगते चाँद की ठंडाक
और जो तब भी
बूढ़ा होने से पहले हो जाए बंजर
एक शहर
लोग कहते हैं
जिसका अक्स कभी
झील में चमकते परीलोक-सा
लगता था

एक शहर जिसके
सुर्ख चेहरे पर चढ़ा हो पीला लेप
जिसके जिस्म से गुजरते हों
उन्माद के ज्वार अक्सर
जहां आदिम मुद्दों
पर चलती हो बहसें
दिन-रात
ठेका-पट्टों और लाईसेंसों की
बिसात पर नाचती हो सियासत

एक शहर
जहाँ पलते हों विराट राष्ट्र के
सैन्य स्वप्न और
टाउन से उपस्थित हो गाउन
ये वो शहर तो नहीं
जिसके बारे में
उजली हंसी के छोर पर बैठ
आधी सदी से
सोच रहे हो परमानंद
या जहां कॉमरेड जीता कौर ने
रामगढ़ ताल के किनारे
माथे पर साफा बांध
छोटी जमीन वाले किसानों
और बुझी आँखों वाली
स्त्रियॉं के मन में
जगाया था संघर्ष और जीत का जज्बा

ये वो शहर है
जहां से आरंभ होगा
हमारी सदी का शास्त्रार्थ
जिसमें भाग लेंगे नीमार,गजोधर, रुक्मा और भरोस
और कछारों के वे किसान
जिनके खेतों में उगती
रही है भूख
वे जुलाहे जिन्होंने
चरखों की खराद पर काटी हैं
अपनी उंगलिया
वे मजदूर जो
ठंडे पड़ गए कारखानों की
चिमनियों से लिपट पुश्तों से कर रहे
अपनी बारी का इंतजार

इस शास्त्रार्थ में
उतरेंगी वे लड़किया भी
जो दादी नानी के जमाने से
जवान होने की ललक में
हो जाती हैं बूढ़ी
और पूछेंगी
अपने जीवन का पहला प्रश्न
और स्वयं ही देंगी
उसका जवाब

हमारी सदी के
इस अद्भुत विमर्श
को सुनेंगे
योग भोग के पुरोधा
पांडे और पुरोहित
मौलवी और उलेमा
हाकिम-हुक्काम
सेठ-साहूकार
मंत्री और ठेकेदार

इस शास्त्रार्थ में
नहीं होंगे वे विषय
जिन्हें पाषाण काल से पढ़ाते रहे
परमपूज्य गुरुवर
और न ही होंगे वे
मसाइल
जिनके समाधान में
मालामाल होते रहे मुंसफ और वकील

हमारी सभ्यता के
इस उत्तर-आधुनिक समय में
पूछे जाएँगे
संस्कृति के आदिम प्रश्न
कि पंचो के राज में
भूख से क्यों मारता है बिकाऊ ?
कि मछुआरों के खेल में
कैसे सूखते हैं ताल?
कि इतने भाषणों के बावजूद
दरअसल क्यूँ मर जाती है भाषा?
कि इस शहर में प्रेम करना क्यूँ है इतना मुश्किल ?

या फिर
सिर्फ यही
कि ये जो शहर है गोरखपुर
ये वह शहर क्यूँ नहीं?                  

जसम का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन

जन संस्कृति मंच का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन
31जुलाई- 01अगस्त, 2015

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि 
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौन्दर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति,
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद-
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ, सुन्दर जाल-
केवल एक जलता सत्य देने टाल

मुक्तिबोध : 
'पूंजीवादी समाज के प्रति' शीर्षक कविता (1940- 42) से 


2015  के भारत के नए 'कंपनी राज' के नेताओं-कारिंदों की मानें तो तमन्नाओं और हसीन सपनों, इसी धरती पर स्वर्ग का आनंद लेने, फैशन, लाइफस्टाइल और अंतहीन उपभोग के विश्व-प्रतिमानों को छू लेने का समय भारतवासियों के लिए आ गया है. बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, आठ लेन की सड़कें, खूबसूरत विश्वस्तरीय कारें, क्लब, पब, होटल और अपार्टमेंट्स, हैरतंगेज़ उपभोक्ता वस्तुएं जिनके लिए 'इंडिया' का दिल धड़कता है, अब हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रही हैं. अच्छे दिन आ गए हैं. पूंजीवाले सारी दुनिया से आ रहे हैं 'नया इंडिया' बनाने. हमें बस उन्हें अपनी प्राकृतिक और बौद्धिक संपदा मुक्त हाथों से सौंप देनी है. दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा बेरोजगार और गरीब यहाँ रहते हैं, वे असंभव सी मजदूरी दर पर काम करके 'हमारे' सपनों का भारत बना डालेंगे.

भारत का वर्तमान 'कंपनी राज', अपना अलग 'ज्ञान-काण्ड' रच रहा है, सौन्दर्य के अपने प्रतिमान निर्मित कर रहा है. मुनाफे के लिए अबाध लूट को 'सबका विकास' बता रहा है, जबकि विकास दर की बुलंदियों के वर्षों में भी औसत हिन्दुस्तानी की खाद्य ज़रुरत (कैलोरी इंटेक) में लगातार कमी यानी गरीबों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. पिछले एक साल में किसान आत्महत्या कुछ प्रदेशों से बाहर निकलकर पूरे भारत की परिघटना बन गयी है. यही वे जलती सच्चाइयां हैं जिन्हें टाल देने को एक अद्भुत सुन्दर जाल बिछाया गया है. लगता ही नहीं कि दुनिया के सबसे ज़्यादा गरीब, सबसे ज़्यादा बेरोजगार, सबसे ज़्यादा निरक्षर इसी देश के रहनेवाले हैं.

यह एक बहुत पुराना देश है हमारा जहां खेत-खलियान, नदियाँ, पहाड़, जंगल और मनुष्य- सब का अब एक ही मूल्य निश्चित किया जा रहा है- वह यह कि वे 'मुनाफे की सभ्यता' के कितने काम के हैं, कितने नहीं. इनके मालिक अब देशवासी नहीं , बल्कि देशी-विदेशी पूंजी के सरदार होंगे. भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857) के दौरान अजीमुल्ला खान द्वारा रचित राष्ट्रीय गीत की पहली पंक्ति थी- 'हम हैं मालिक इसके हिन्दोस्तान हमारा'. अब इस देश की मालिक हैं 'कम्पनियां'. इन कंपनियों के मुनाफे की प्यास बुझाने के लिए कितने खेत-खलियान काम आएँगे, कितनी नदियाँ बांधी, उलीची या कचरों से पाटी जाएँगी, कितने पठार-पहाड़ धरती के गर्भ में छिपी निधियों की लूट के लिए तोड़े जाएंगे, कितने जंगल मुनाफे की आग मे जलेंगे और कितने मनुष्य जो इन पर निर्भर हैं अपनी जड़ों और जीविका के साधनों से उखाड़े जाएंगे, इनका आकलन, सर्वेक्षण करके पूंजी के सरदारों को सौंपना आज 'ज्ञान' कहला रहा है. प्रकृति और मनुष्य के श्रम (शारीरिक और बौद्धिक) को पूंजी के मुनाफे में तब्दील करने में बहुत सा प्रबंधन, बहुत सा शोध, बहुत सा कौशल, बहुत सी प्रौद्योगिकी, बहुत सी कला, बहुत सा ज्ञान-विज्ञान लगा है और यही आज की 'नॉलेज सोसायटी' का क्रिया-व्यापार है.

अब अंतिम तौर पर यह बात समझ लेने की है कि शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, हवा. भोजन और मकान जैसी चीज़ें नागरिकों का अधिकार नहीं है, जिन्हें सुनिश्चित करने को सरकारें चुनी जाती हैं. अब ये सब चीज़ें पूंजी के मालिकों से खरीदनी होंगीं और उन्हीं के लिए और उसी अनुपात में उपलब्ध होंगी जिनके पास जितने लायक पैसा है. यही 'गवर्नेंस' है.

पिछले 25 सालों से जारी भारत के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में पिछला साल एक नया और खतरनाक मोड़ लेकर उपस्थित हुआ. विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (2008, 2011) से पूंजी के मुनाफे की दरों की बढ़त में रुकावट आई. मुनाफे को बढाने का एकमात्र तरीका था प्राकृतिक संसाधनों की लूट और श्रमशक्ति के अबाध शोषण के रास्ते में आनेवाली हर बची खुची बाधा को निर्ममता के साथ ख़त्म करना. श्रम क़ानून और मनरेगा जैसी योजनाएं श्रमशक्ति की लूट में बाधा थीं और भूमि अधिग्रहण क़ानून, वन अधिकार क़ानून, खाद्य सुरक्षा कानून आदि प्राकृतिक संसाधनों की लूट के रास्ते की रुकावटें थीं. इस लूट-पाट पर निगरानी रखने और जनता की नज़र में लानेवाले सूचना के अधिकार जैसे क़ानून और न्यायपालिका, सी.वी.सी., सी.ए.जी. आदि संस्थाओं को निष्प्रभावी बनाना ज़रूरी था, अर्थजगत में अभी भी बहुत कुछ ऐसा बच गया था जिसे निजी पूंजी के हवाले किया जाना था. यह सब जो कारगर ढंग से कर सके और साथ ही साथ जनता को रंगीन सपने बेचते हुए जन-आन्दोलनों का निर्भीक तरीके से दमन कर सके, लोकतांत्रिक आवरण में ऐसे अधिनायकवाद की कारपोरेट मांग 'मोदी परिघटना' के रूप में सफल हुई.

पूंजी की सता आज निरंकुश आत्मविश्वास से भर कर बोल रही है, "सब हमें चुपचाप सौंप दो! किसानों! जमीन लेने से पहले, हम तुमसे पूछेंगे नहीं. जंगलों और पहाड़ों पर रहनेवालों! तुम्हारे पहाड़ों और जंगलों का मूल्य हम जानते हैं, इन्हें हमारे लिए खाली करो, हम तुमसे पूछेंगे नहीं. मजदूरों, श्रम कानूनों के चलते जो कुछ सुरक्षाएं तुम्हें मिली हुईं थी, अब वे बीते दिनों की बातें होंगी. तुम्हारी संगठित सौदेबाजी, तुम्हारी हड़तालों के दिन लद चुके हैं. देखो, हम खेत, खलियानों, जंगल, पहाड़ों से कितनी बड़ी तादाद में उखड़े हुए लोगों की फ़ौज खड़ी कर रहे है, हमारे लिए काम करने के लिए. मुनाफे की राह में सारी बाधाएं दूर करने का हमें 'जनादेश' मिला है. तुम जिसे मुनाफ़ा कह रहे हो, वही 'विकास' है. अधिकारों और संघर्षों के लिवे सड़क पर उतरनेवालों, सावधान! संविधान में प्रदत्त अधिकार दमन से तुम्हारी रक्षां नहीं कर सकेंगे." सच है कि तीसरी दुनिया के देशों में नव-उदारवाद का काम पूंजीवादी लोकतंत्र के अपेक्षया उदार रूप से नहीं , बल्कि अंततः तानाशाही रूप से ही चला करता है.

विकास एक खूबसूरत गुब्बारा है, जो मीडिया के आसमान में बुलंदियों को छू रहा है. मीडिया का बड़ा हिस्सा किसी भी समय से ज़्यादा अब पूंजी के घरानों के हाथ में है. कारपोरेट मीडिया लूट की डोर से बंधी झूठ की पतंग की मानिंद हमारी चेतना के आकाश में लहरा रहा है. लूट और झूठ के साथ टूट और फूट वर्तमान कारपोरेट सत्ता-संस्कृति के प्रमुख अस्त्र हैं. जो लोग सिर्फ 'सूट-बूट' से उसकी शिनाख्त कर रहे हैं, वे 'लूट-झूठ-टूट-फूट' में खुद की संलिप्तता पर पर्दा डाल रहे हैं. राष्ट्रीय, जातिगत, लैंगिक, धार्मिक, नस्लीय और क्षेत्रीय पहचानों और आकांक्षाओं को शान्ति, बराबरी, सौहार्द्र की जगह आपसी वैमनस्य, हिंसा और प्रतिशोध की दिशा में नियोजन अब सूचना और संचार के आधुनिकतम साधनों के ज़रिए भारी प्रबंध-कुशकता के साथ किया जा रहा है. व्हाट्स एप्प या इंटरनेट पर फर्जी तस्वीरें या वीडियो अपलोड करके दंगे कराए गए हैं, हत्याएं की गयी हैं. प्रशिक्षित स्थानीय साम्प्रदायिक टोलियाँ टूट-फूट या तोड़-फोड़ की कार्यवाहियों में दुगुने आत्मविश्वास से जुटी हुई हैं- 'सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का'. सांप्रदायिक उन्माद की गुंजायश तलाशते सत्ताधारी सांसद, मंत्री, प्रवक्ता अपने बयानों से इन टोलियों को उत्साहित करते हैं. कभी अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक धर्म में 'घरवापसी' की सीख दी जाती है, कभी उन्हें मताधिकार से वंचित करने की धमकी, तो कभी उनके धर्मस्थलों को हमले का निशाना बनाया जाता है. कारपोरेट लाभ-लोभ के विरुद्ध काम करनेवालों या फिर सत्ता-प्रेरित साम्प्रदायिक गतिविधियों के विरुद्ध लड़नेवाले सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं को फर्जी मामलों में फंसाने में राजसता का सीधा उपयोग अब आम बात है.

आज आलोचना की संस्कृति का ध्वंस या उसे निष्प्रभावी बनाने के नित नए हथकंडों का आविष्कार और उन्हें आजमाया जाना बताता है कि 'जलती हुई सच्चाइयों' के साक्षात्कार को टाल देने के कितने भी निपुण प्रयास पूंजीवादी समाज करता हो, वह मानवीय विवेक-बुद्धि की प्रतिरोधी आलोचनात्मक चेतना को अंततः हर नहीं सकता, अतः दमन का सहारा लेना ज़रूरी हो उठता है. यह संभव नहीं कि जिस समाज का तेज़ी से 'स्वत्वहरण' किया जा रहा हो, 'लूट-झूठ-टूट-फूट' की सत्ता-संस्कृति जिसे भौतिक और चेतनागत धरातल पर विघटित कर रही हो, उसका कोई भी हिस्सा इसके बारे में विवेकपूर्ण ढंग से न सोचे और इस प्रक्रिया की आलोचना न करे. 'जलते सच' को देखने और दिखाने के लिए बुद्धि-विवेक की आँखें चाहिए. समाज की इन आँखों को अंधा करने के लिए, उनकी विवेक-बुद्धि को हर लेने के लिए, उनकी वर्तमान दुरावस्था की क्षतिपूर्ति के बतौर अतीत की रमणीय मिथकीय कल्पनाओं की आपूर्ति करने से लेकर एक भ्रष्ट और उन्मादी इतिहास-बोध में समाज को दीक्षित करने का काम शिक्षा, संस्कृति और नागरिक समाज की विभिन्न संस्थानों के ज़रिए सरकार तेज़ी से करने में जुटी हुई है. इस सत्ता-संस्कृति के दोनों बाजुओं यानी कारपोरेट लोभ और साम्प्रदायिक उन्माद, किसी भी पक्ष के प्रति आलोचनात्मक चेतना का निर्माण करनेवाले संस्कृतिकर्मियों को अपमानित, प्रताड़ित और असहाय बनाना इस सत्ता-संस्कृति की ज़रुरत है. किताबों को जलाना, नाटकों का मंचन रोक देना, फिल्मों का प्रदर्शन, सभाओं और सेमिनारों को बाधित करने की तो एक परम्परा ही बन गयी है, जो अब प्रत्यक्ष सता-संरक्षण में उफान पर है.

आज एक नया विमर्श रचने की ज़रुरत है. स्वतंत्रता, समानता, नागरिक अधिकार, सामाजिक न्याय, अभिव्यक्ति और सृजन की आज़ादी, आर्थिक स्वावलंबन और धर्मनिरपेक्षता के विमर्श, मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के सभी रूपों के अंत के सपने कभी पुराने नहीं पड़ेंगे, लेकिन उन्हें भी मानव-मुक्ति के वर्तमान युग-धर्म के रूप में नया विन्यास चाहिए. हम संस्कृतिकर्मी अपने समस्त कला-कर्म, सृजन और संघर्ष के सभी रूपों की मार्फ़त इस नूतन विन्यास को रच सकें, इसी मंथन और तैयारी के लिए हम 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रेमचंद जयंती (31जुलाई) और 01अगस्त को दिल्ली में मिल रहे हैं. आपका साथ हमारी ताकत और संबल होगा.

( जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय परिषद् द्वारा जारी) 

वेदना नदी का जल- प्रियम अंकित

( मुक्तिबोध की चर्चित कविता 'अंधेरे में' के 50 वर्ष होने पर देश भर में विचार गोष्ठियों का आयोजन हुआ। इन आयोजनों ने मुक्तिबोध को नए सिरे से पढ़ने की अनिवार्यता को रेखांकित किया। इलाहाबाद में हुए एक आयोजन में जसम के राष्ट्रीय पार्षद और लब्ध प्रतिष्ठा युवा आलोचक श्री प्रियम अंकित ने यह आलेख पढ़ा था।)  


   अंधेरे में  एक ऐसी कविता है, जो अपने लिखे जाने के समय से ही, अपने वर्तमान से जूझते हुए भविष्य की चिंता करने वाली कविता है। इसलिये यह एक भविष्योन्मुखी कविता है। अर्थात समय और यथार्थ के लगातार बदलने के बावजूद अपने अस्तित्व की प्रासंगिकता को, उसकी अनिवार्यता को लगातार सिद्ध करने वाली कविता। क्यों यह कविता पचास बरस बीतने के बाद भी हमारे लिये अनिवार्य बनी हुई है? कई आलोचकों ने इस कविता को समझने और समझाने के गझिन और जटिल प्रयास किये हैं।  कई बार उनकी यह आलोचना पाठक के लिये बोझिल हो गयी है। फिर भी यह कविता अपने कठिन शिल्प के बावजूद पाठकों के बीच उत्तरोत्तर लोकप्रिय होती जा रही है। इस कविता की फैंटेसी में एक प्रसंग है, जहाँ काव्यनायक को पकड़ कर एक अंधेरे कमरे ले जाया जाता है और पार्श्व से आवाज़ आती है – स्क्रीनिंग करो – मि. गुप्ता / क्रॉस एक्ज़ामिन हिम थॉरोली अंधेरे में  की कई आलोचनाएं पढ़ने पर ऐसा लगता है कि इस कविता को भी ‘क्रॉस एग्ज़ामिन’ किया जा रहा है, कभी मनोविश्लेषणवादी चश्मे से, कभी अस्तित्ववादी, कभी शुद्ध मार्क्सवाद के चश्मे से, कभी शुद्ध कविता के चश्मे से, तो कभी इन सबके घाल-मेल से। लगता है जैसे आलोचकों पर दबाव है। दबाव इस कविता को अपने मन माफिक व्याख्यायित करने का। दबाव का स्वर मानो यह हो कि “ मि. क्रिटिक – स्क्रीनिंग करो / क्रॉस एक्ज़ामिन द पोएम थॉरोली।” शायद कोई पश्यत् कैमरा मिल जाए जिसमे यह रिकार्ड हो कि कविता में अस्तित्ववाद कितना है, मनोविश्लेषणवाद और मार्क्सवाद कितना है। लेकिन यह कविता ‘क्रॉस-एक्ज़ामिनेशन’ के तमाम आलोचकीय प्रयासों को पराजित करती है। क्यों? इसलिये कि यह कविता हमारे समय और समाज की सबसे तीखी, सारगर्भित और दुर्लभ आलोचना है। दुर्लभ इसलिये कि हमारे समय और समाज की ऐसी सारगर्भित आलोचना और इस आलोचना से उभरने वाली भविष्यमूलक दृष्टि हिंदी कविता के इतिहास में दुबारा घटित नहीं हुई। कविता ‘खोये हुए’ की ‘खोज’ करने वाली कविता है। खोज की प्रक्रिया में रहस्य-रोमांच पैदा करने वाली घटनाओं से हमारा सामना होता है। ये घटनाएं व्यक्ति और समाज के संदर्भ में एक वृहत्तर अनुभव को समग्रता में निर्मित करती हैं। ज़रूरत इस समग्र और वृहत्तर अनुभव को आत्मसात करने की है।
    हमारी परंपरा में अंधेरे को अज्ञान का , अत्याचार का और अनाचार का प्रतीक माना गया है; जबकि उजाले को ज्ञान का, न्याय का और समरसता का। परंपरा में अंधेरे से उबरने के लिये किसी मसीहा या आप्त-पुरूष का आह्वाहन किया जाता रहा है। ऐसे मसीहा या आप्त-पुरूष का, जो अपने साथ ज्ञान का प्रकाश लाता है और अज्ञान एवं अत्याचार के अंधेरे को दूर भगाता है। अंधेरे में की फैंटेसी से रू-ब-रू होते हुए यह प्रश्न अक्सर सामने आता है क्या इस कविता में भी अंधेरे और उजाले का वैसा ही द्वंद्व है, जैसा परंपरा से हमें मिला है? क्या यह कविता भी किसी मसीहा या आप्त-पुरूष का आह्वाहन करती है। निस्संदेह इस कविता में एक पुरूष है – ‘रक्तालोक-स्नात पुरूष’। और ‘परम अभिव्यक्ति अनिवार आत्म-संभवा’ है। ये दोनो अंधेरे के खिलाफ संघर्षरत जनता के साथ हैं, उसके भीतर हैं, उसका अभिन्न अंग हैं। इस जनता से स्वतंत्र उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे जनता की अपनी निधि है। मुक्तिबोध इस कविता में परंपरा का सचेत अतिक्रमण करते हैं। उनके यहाँ भी अंधेरे और उजाले का द्वंद्व है, लेकिन अंधेरे और उजाले का जो ‘ट्रीटमेंट’ है, वह परंपरा से हटकर है। अंधेरे में कविता में जो उजाला है, वह दो तरह का है। एक उजाला वह जो सत्ता द्वारा निर्मित है – उसी सत्ता द्वारा जिसने अंधेरे का निर्माण किया है। इस उजाले में सत्ता अपने समस्त ढोंग के साथ नमूदार होती है, अपने ‘राक्षसी स्वार्थों’ को अपने शालीन आवरणों में ढाँककर षड्यंत्र रचती है –
   गहन मृतात्माएं इसी नगर की
  हर रात जुलूस में चलतीं
  परंतु दिन में
  बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
 विभिन्न दफ्तरों-कार्यालयों, केंद्रों में और घरों में
    इन पंक्तियों में जो ‘दिन’ है, वह सत्ता द्वारा गढ़े गये उन्हीं उजालों से निर्मित है, जहाँ क्रूर, स्वार्थी और अमानुषिक राजनीति की देह चमचमाते एवं लुभावने आवरण से ढँकी जाती है। इस दिन के उजाले में हर उस व्यक्ति को पागल समझा जाता है जो सत्ता के हितों के साथ अपना तालमेल नहीं बिठा पाता, उसका मौन अनुसरण नहीं करता। ऐसा ही पागल इस कविता में भी है – पागल था दिन में / सिरफिरा विक्षिप्त मस्तिष्क। यह उजाला भय और आतंक की स्रष्टि करता है, भय पागल समझे जाने का। इसीलिये हम अपनी संवेदनाओं को, अपनी पीड़ाओं और मानवीय मूल्यों को अपनी आत्मा के अंधेरे कोनों में, ‘अंतराल-विवर के तम’ में और ‘तिलिस्मी खोहों’ में ‘गुहावास’ दे देते हैं। इस तरह यह उजाला अंधेरे से आवृत है, अंधेरे का सहचर है। एक मामूली सा उदाहरण है, उजाले में सारे बनाव-श्रंगार में प्रकट होने की लालसा साधारण बात है, परंतु अंधेरे में समस्त बनाव-श्रंगार से मुक्त होकर ‘कंफरटेबल मुद्रा’ में आना भी आम है। सत्ता की ‘कंफरटेबल मुद्रा’ कौन सी है? जनता के ऊपर दबंगई की मुद्रा! सत्ता जब दिन के उजाले में टी. वी. चैनलों के माध्यम से या अखबारों के संपादकीय पृष्ठों के माध्यम से सामने आती है तो तमाम लोक-लुभावने आवरण को ओढ़ कर। लेकिन जब अत्याचार और शोषण का अंधेरा गहराता है, तो इस अंधेरे में यही सत्ता इन सारे ढोंगों से निरावृत होकर अपने नग्न रूप में उपस्थित होती है। ज़रूरत उस दृष्टि की होती है, उस आँख की होती है, जो इस अंधेरे में, और इस अंधेरे द्वारा आवृत दिन में सत्ता को उसके नंगे रूप में देख सके। यह आँख मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में की फैंटेसी में मौजूद है। आज यह अंधेरा लगातार गहरा रहा है, घना होता जा रहा है। आज हमें इस आँख की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है। इसीलिये हम आज मुक्तिबोध की इस कविता की तरफ बार-बार लौटते हैं और अपने दौर के लिये उसे सर्वाधिक प्रासंगिक और अनिवार्य पाते हैं।
     कविता में दूसरे किस्म का उजाला भी है – ‘सत्-चित्-वेदना-भास्वर’ द्वारा निर्मित उजाला। यह ‘सत्-चित्-वेदना-भास्वर’ हमें आत्म-संघर्ष से प्राप्त होता है। यह आत्म-संघर्ष एक स्तर पर निजी संघर्ष हो सकता है, लेकिन यह अपनी सार्थकता को तभी प्राप्त होता है, जब वह जन-संघर्ष के वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में घुल-मिलकर उससे एकमेक हो जाता है। अंधेरे में  की फैंटेसी में मुक्तिबोध का काव्यनायक बेहद यंत्रणा-भरी राहों से गुज़र कर बेतरह भटकता है। इस कदर कि उसके भटकाव को समेटने में पूरी कविता बिखर गई है। इस बिखराव और भटकाव में बहुत ‘कनफ्यूज़न’ हो सकता है। लेकिन यहाँ एक बात है, जिसमें कोई ‘कनफ्यूज़न’ नहीं है। वह यह कि जो कुछ भी हमारी ‘निजी’ चेतना के खाते में आता है, वह समाज से पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। ‘निजता’ और ‘सामाजिकता’ एक-दूसरे से द्वंद्वात्मक रूप में पूरी जीवंतता के साथ आबद्ध हैं। अंधेरे में कविता में ‘निजी’ और ‘सामाजिक’ के इस जीवंत और द्वंद्वात्मक संबंध को जो उजाला उद्घाटित करता है, वह ‘सत्-चित्-वेदना-भास्वर’ द्वारा निर्मित है। ‘सत्-चित्-वेदना-भास्वर’ यानि सत्ता के ‘राक्षसी स्वार्थों’ के विरूद्ध संघर्षरत जनता की सच्ची और पवित्र वेदना के ताप से पैदा हुआ प्रकाश। आज पचास साल बाद लगातार गहराते अंधेरे में इसी प्रकाश के तेजस्वी आलोक को एक मूल्य की तरह बरतने की तमीज़ हमें यह कविता देती है, जिससे बेहतर समाज-व्यवस्था का निर्माण किया जा सके। मुक्तिबोध के काव्यनायक के शब्दों में कहें तो –
                       सवाल है – मैं क्या करता था अब तक,
                       भागता फिरता था सब ओर।
                       (फिज़ूल है इस वक्त कोसना खुद को)
                       एकदम ज़रूरी दोस्तों को खोजूँ
                        पाऊँ मैं नये-नये सहचर
                        सकर्मक-सत्-चित-वेदना-भास्वर !!
    अधेरे में की फैंटेसी में तीन पंक्तियाँ है, जो टेक की तरह बार-बार आती हैं। भागता मैं दम छोड़ / घूम गया कई मोड़ ; दूसरी है – अब तक क्या किया / जीवन क्या जिया और तीसरी है – कहीं आग लग गयी कहीं गोली चल गयी । कविता का लक्ष्य है अभिव्यक्ति की खोज और कविता में टेक की तरह आने वाली ये तीन पंक्तियाँ इस खोज के तीन पड़ाव हैं। इन पड़ावों से गुज़र कर ही हम खोजी जा रही अभिव्यक्ति के चरित्र की पहचान कर पाते हैं।
      काव्यनायक अंधेरे में सता को उसके नग्न रूप में देखता है – मृत्यु-दल की शोभायात्रा के रूप में। कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल आदि के साथ-साथ इसमें ऐसे चेहरे शामिल हैं, जिन्हें देखकर वह कहता है –
                  भई वाह !
                  उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक जगमगाते कवि-गण
                  मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान
                  यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
                  डोमाजी उस्ताद
                   बनता है बलबन
                   हाय, हाय !!
                   यहाँ यह दीखते हैं भूत-पिशाच-काय ।
                   भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
                   साफ उभर आया है,
                  छिपे हुए उद्देश्य
                   यहाँ निखर आये हैं,
                    यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की।

         इस शोभायात्रा के सदस्य काव्यनायक को देख लेते हैं और शोर मचता है – “मारो गोली, दागि स्साले को एकदम / दुनिया की नज़रों से हटकर / छिपे तरीके से / हम जा रहे थे कि / आधीरात – अँधेरे में उसने / देख लिया हमको / व जान गया वह सब / मार डालो, उसको खत्म करो एकदम” । काव्यनायक को लगता है – हाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा, / इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी ।
    अब सत्ता उसके साथ जो बर्ताव करेगी उसकी भयानकता असीमित है, जिसे अनगिनत काली-काली हायफन-डैशों की लीकें वाले बिंब द्वारा मूर्त किया गया है। काव्यनायक को भान होता है कि सेना ने घेर ली हैं सड़कें और मार्शल लॉ लग चुका है। फिर शुरू होती है टेक – भागता मैं दम छोड़ / घूम गया कई मोड़ । इस टेक के अलग-अलग अंतरालों में जो घटनाएं घटती हैं, वे काव्यनायक के मध्यवर्गीय संस्कारों को करारा आघात पँहुचाती हैं। हर घटना उसके मानसिक द्वंद्व को गहराती है। जैसे-जैसे इस टेक के साथ कविता आगे बढ़ती है, काव्यनायक की अंतर्दृष्टि में निखार आता जाता है। उसे एहसास होता है कि –
                       विवेक चलाता तीखा-सा रंदा
                       चल रहा वसूला
                       छीले जा रहा मेरा निजत्व ही कोई
   काव्यनायक को उसके मध्यवर्गीय संस्कारों से उबरने और उसकी निजता को इन संस्कारों की ‘तिलिस्मी खोह’ से मुक्त करने की राह दिखने लगती है। यहीं काव्यनायक को यह अभिज्ञान होता है कि उसके मध्यवर्गीय संस्कारों ने उसे उस जनता से दूर कर रखा था, जो ‘उसके ही विक्षोभ-मणियों को लिये’ और ‘उसके ही विवेक-रत्नों को’ लेकर अंधेरे में आगे बढ़ी जा रही है।  इसी टेक के अंतरालों में काव्यनायक को मिलता है वह भयंकर बरगद – सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों, / गरीबों का वही घर, वही छत, / उसके ही तल-खोह-अंधेरे में सो रहे / गृह-हीन कई प्राण । यहीं उसे मिलता है वह सिरफिराजन – ‘जो पागल था दिन में’। आज पचास बरस बाद यह पागल पहले से ज़्यादा प्रासंगिक हो चुका है। इस पागल के ‘करूण रसाल स्वर’ आज कई गुना ज़्यादा आवेग के साथ हमारे जड़ मध्यवर्गीय संस्कारों पर करारी चोट कर रहे हैं –
                     “ओ मेरे आदर्शवादी मन,
                     ओ मेरे सिद्धांतवादी मन
                     अब तक क्या किया?
                     जीवन क्या जिया !!
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                    लोक-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
                  जन-मन-करूणा-सी माँ को हंकाल दिया,
                  स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया,
                  भावना के कर्तव्य – त्याग दिये,
                  हृदय के मंतव्य – मार डाले !
                  बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
                  तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,
                  जम गये, जाम हुए फँस गये,
                  अपने ही कीचड़ में धँस गये !!
                  विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
                  आदर्श खा गये !
                   -------------------------
                   ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
                   मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम.....”     
                   
     
  काव्यनायक कहता है कि यह करूण रसाल स्वर गद्यानुवाद हैं। सवाल है कि गद्यानुवाद क्यों? कविता की भाषा में क्यों नहीं? क्या मुक्तिबोध कविता के शिल्प को लेकर सशंकित हैं? या फिर मुक्तिबोध सिर्फ एक साहित्यिक रूढ़ि का निर्वाह कर रहे हैं, जिसमें शेक्सपीयर से लेकर मंटो तक के पागल चरित्र किसी सार्थक बात को गद्य में ही कहते हैं? वैसे इस कविता की कुछ पंक्तियाँ यह बताती हैं कि मुक्तिबोध को लगता था कि बहुत सी बातें ऐसी हैं, जो कविता में नहीं कही जा सकतीं। उदाहरण के लिये – कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ / वर्तमान समाज चल नहीं सकता। / पूँजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता, / स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी / छल नहीं सकता मुक्ति के मन को / जन को। अँधेरे में को पढ़ने के बाद यह एहसास तीव्रतर होता जाता है कि मुक्तिबोध ने यह कविता लिखी ही इसलिए है कि वे उन बातों को कह दें, जो कविता में नहीं कही जातीं। अर्थात मुक्तिबोध सचेत रूप में इस कविता को कविता की तरह रचना ही नही चाहते। इस कविता में कविता के शिल्प का वह चुस्त-दुरूस्त सांगठनिक सौंदर्य कहीं नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध इस कविता में कविता के शिल्प से ही विद्रोह कर रहे हैं – एक सचेत और सकर्मक किस्म का विद्रोह। इस बात की पुष्टि इन पंक्तियों से भी होती है – किंतु, असंतोष मुझको है गहरा / शब्दाभिव्यक्ति अभाव का संकेत। / काव्यचमत्कार उतना ही रंगीन / परंतु ठण्डा। रंगीन काव्यचमत्कारों में मुक्तिबोध की कोई आस्था नहीं है। अर्थात मुक्तिबोध को कविता में चमकीले अलंकार नहीं चाहिये, जो लुभावने तो बहुत हों, किंतु जनसंघर्ष की ऊष्मा का ताप जिनमें न हो। चाहत जनसंघर्ष की ऊष्मा से पगे शब्दों की है, जो ‘आत्मा के चक्के पर’, ‘संकल्पशक्ति के लोहे का मजबूत ज्वलंत टायर’ चढ़ा सकें। कविता अभिव्यक्ति का माध्यम है। यह नहीं भूलना चाहिये कि अंधेरे में अभिव्यक्ति की खोज की कविता है। अँधेरे में शिल्प की दृष्टि से एक मुकम्मल कविता न सही, लेकिन एक मुक्कमल कविता होने की खोज की कविता है। यह खोज खतरनाक है क्योंकि यह मठों और गढ़ों के वर्चस्व को चुनौती देने वाली खोज है। खतरनाक खोज में प्रवृत्त व्यक्ति के पैरों में छाले पड़ते हैं और त्वचा छिलती है। उसी तरह इस कविता के वाक्यों में भी छाले हैं, इसके शब्द छिल चुके हैं, कविता का प्रवाह जगह-जगह अवरूद्ध और टूटा-फूटा है।
    वास्तव में कविता में आया यह अवरोध, यह टूट-फूट, और यह बिखराव काव्यनायक के मानसिक अवरोध, टूट-फूट और बिखराव से अभिन्न है। यह एक स्तर पर कला और कलाकार की एकता का और दूसरे स्तर पर व्यक्ति और समाज की एकता का सूचक है। एकता का यह अनुभव जब व्यक्ति और कलाकार को होता है तो वह बेचैन हो उठते हैं। वे क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की खतरनाक राहों पर कदम बढ़ाते हैं, इस संकल्प के साथ कि अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। / तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब। / पँहुचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
   मुक्तिबोध के लिये कविता सामाजिक परिवर्तन का सहयोगी कर्म है। इसीलिये उनकी रचनाधर्मिता कविता की चिकनी और शफ्फाक़ सतह को तोड़ कर खुरदुरा बनाती है और शब्दों को छीलती है।
   तो यह कविता, कविता के शुद्धतावादी शिल्प से विद्रोह की कविता है। कला कला के लिये वाला जो शुद्ध सौंदर्यवाद है, अँधेरे में कविता उस पर मरणांतक प्रहार करती है। जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता जाता है कि काव्यनायक, कलाकार भी है। इस कविता की तीसरी टेक है – कहीं आग कग गयी कहीं गोली चल गयी । इस टेक के जो अंतराल हैं, उनमें काव्यनायक के निजी मध्यवर्गीय संस्कारों का जनक्रांतिधर्मी सामाजिकता में रूपांतरण हो जाता है और कलाकार के निजी शुद्धतावादी आग्रहों का कला की उस चेतना में लोप हो जाता है, जो अपने सामाजिक दायित्व के प्रति अत्यंत सजग है। कविता की यह तीसरी टेक मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति, क्राँति के मार्क्सवादी दर्शन के प्रति मुक्तिबोध के समर्पण की गवाह है। मार्क्सवादी विचारधारा के संदर्भ में इस कविता पर रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के बीच काफी बहस हुई है। कविता का जो आख़िरी या आँठवां खण्ड है, वह विचारधारा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। सामाजिक क्राँति की राह में एकजुट होती जनशक्ति को यहाँ साफ-साफ पहचाना गया है – साथ-साथ घूमते हैं, साथ-साथ रहते हैं, / साथ-साथ सोते हैं, खाते हैं, पीते हैं, / जन-मन उद्देश्य !!  क्राँति की राह से अपने को तटस्थ मानकर, अपने कला-कर्म से स्वयँ को गौरवान्वित मानने वाले कलाकारों की नपुंसकता को यहाँ पहचाना गया है – सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक् / चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं / उनके खयाल से यह सब गप है / मात्र किंवदंती। / रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग / नपुंसक-भोग-शिरा-जालों में उलझे । ये वही कलाकार हैं, जो वर्ग-विभाजित समाज में अपनी भूमिका को पहचानने से इंकार करके सत्ताशाली वर्ग का समर्थन करते हैं। प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक ग्राम्शी ने कहा था कि सत्ता भौतिक बल यानि लाठी-डण्डा-मॉर्शल लॉ इत्यादि रूपों के प्रयोग से ज़्यादा हमारी सहमति द्वारा हमारा शोषण करती है, हम पर अपना वर्चस्व स्थापित करती है। इस सहमति, इस वर्चस्व के निर्माण में बौद्धिक-वर्ग उसका समर्थन करता है। इस समर्थन के बदले सत्ता इन बौद्धिकों को पुरस्कार और ओहदे बाँटती है। जब समाज में वर्ग-संघर्ष गहराता है, तब यह बौद्धिक-वर्ग सत्ता के पक्ष में जनता को बरगलाने के लिये छद्म संवादों-समीक्षाओं-टिप्पणियों को गढ़ता है। आठवे खण्ड में कविता इसे पूरे संवेदनात्मक पैनेपन के साथ उद्घाटित करती है –
           भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये
           समाचार पत्रों के पतियों के मुख स्थूल।
          गढ़े जाते संवाद,
          गढ़ी जाती समीक्षा, गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूर।
        बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
        किराये के विचारों का उद्भास।
        बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।
        नपुंसक श्रद्धा
       सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी
      कविता की शुरूआत में जिस आत्मा की तिलिस्मी खोह में ‘रक्तालोक-स्नात पुरूष’ चक्कर लगाया करता है, काव्यनायक को आहटों से बेचैन करता हुआ, वही आत्मा अब यहाँ ‘विश्व की मूर्ति में ढल’ चुकी है। ‘दादा का सोटा’, ‘कक्का की लाठी’, ‘बच्चे की पेंपे’ और ‘सलेट पट्टी’ सब कुछ इस विश्व की मूर्ति के सक्रिय अवयव हैं। और यह सब फैंटेसी नहीं है – यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हाँ भाई !!  क्योंकि ‘अब युग बदल गया है,वाकई’ । कहा जाता है कि मुक्तिबोध ने इस कविता की रचना 1957-64 के मध्य की थी। यह आज़ादी के स्वप्न से मोहभंग का काल था। निस्संदेह यह एक युग का अंत था और एक नये युग की शुरूआत थी। मगर कविता में यह जो पंक्ति है – अब युग बदल गया है, वाकई !! – यह मात्र इस बदलाव को स्थूलता में व्यक्त नहीं करती। इस पंक्ति में ‘अर्थ की वेदना’ छिपी हुई है। यह बदला हुआ युग, यह नया युग, जिसकी बात काव्यनायक करता है, वह मध्यवर्गीय बौद्धिक के व्यक्तित्वांतरण की समूची यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मध्यवर्गीय संस्कारों की गिरफ्त में बुरी तरह फँसा बौद्धिक अपने युग की समस्याओं से अनजान था। लेकिन व्यक्तित्वांतरण ने, मध्यवर्गीय संस्कारो से मुक्ति ने उसे युग की सँभावनाओं को पहचानने की तमीज़ दी है। अपने युग के प्रति काव्यनायक की प्रतिक्रिया में अब संपूर्ण बदलाव आ चुका है, इसलिये सिर्फ ‘अब युग बदल गया है’ नहीं, बल्कि ‘अब युग बदल गया है, वाकई’। यह ‘वाकई’ शब्द बहुत मानीख़ेज है, बहुत मूल्यवान है। और इस ‘वाकई’ बदले युग ने शोषण के विरूद्ध संघर्ष-चेतना से उपजी ‘वेदना की स्रोतस्विनी’ को भी मुक्त किया है, जो वर्ग-विभाजित समाज में अदृश्य रहती है, लेकिन जब वर्ग-संघर्ष गहराता है तो वह दृश्यमान हो उठती है –
   
 वेदना नदियाँ
जिनमें कि डूबे हैं युगानुयुग से
मानो कि आँसू
पिताओं की चिन्ता का उद्विग्न रंग भी,
विवेक-पीड़ा की गहराई बेचैन,
डूबा है जिनमें श्रमिक का सन्ताप।
वह जल पीकर
मेरे युवकों में होता जाता व्यक्तित्वान्तर,
        कविता के इसी खण्ड में प्रेम का, अज्ञात प्रणयिनी का भी ज़िक्र है। कुछ लोग अचकचा जाते हैं कि संघर्ष में, गोली की धाँय-धाँय में यह प्रेम और प्रणयिनी कहाँ से आ गयी ! यह ध्यान रखना होगा कि कविता की एक परंपरा वह भी है, जहाँ कबीर से लेकर मीर, ग़ालिब और फैज़ ने संकीर्ण हितों से उबारने वाली और विश्व-बंधुत्व के धरातल पर फैलने वाली चेतना के संदर्भ में प्रेम और प्रणयिनी के रूपक का इस्तेमाल किया है। इन सभी कवियों के काव्य को भी खूब तोड़ा-मरोड़ा गया और मुक्तिबोध की कविताओं की भी ऊल-जुलूल व्याख्यायें की गयीं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा – न कबीर, मीर, ग़ालिब, फ़ैज़ पर और न ही मुक्तिबोध पर।
    अंधेरे में की फैंटेसी का अंत व्यक्तित्वांतरित काव्य नायक के इस संकल्प के साथ होता   है –
खोजता हूँ पठार...पहाड़...समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-सम्भवा।
   यह ‘परम अभिव्यक्ति’, जिसे ‘अनिवार’ भी कहा गया है, उसका एक आयाम यह है कि वह व्यक्ति में सामाजिक-प्रतिबद्धता को और कला में प्रतिबद्ध कलाकार को प्रकाशित करने वाली चेतना है। यह राजनीतिक रूप से सजग चेतना है। यह ‘आत्मग्रस्त’ व्यक्ति की आत्मा को उसके ‘अंतराल-विवर के तम’ से बाहर लाकर ‘विश्व मूर्ति’ में ढालने वाली चेतना है।
    अंधेरे में कविता के काव्यनायक के मानसिक-द्वंद्व, उसके व्यक्तित्वांतरण, जनसंघर्ष की चेतना और कला के दायित्व के प्रति सजगता के भाव से जो अनुभव उपजता है, उसने हमारी भाषा में एक पद को बेहद लोकप्रिय बना दिया है। वह पद है- ‘मुक्तिबोधीय चेतना’। इस पद को बड़े या ख्यातिप्राप्त आलोचकों के बार-बार प्रयोग द्वारा नहीं, बल्कि पाठकों के लगाव द्वारा स्थापना मिली है। यह मुक्तिबोध के काव्य की व्यापक ‘अपील’ का सबूत है। अंधेरे में को पढ़ने के बाद मुक्तिबोध के व्यक्तित्व से अभिन्न रूप में जुड़े यह शब्द याद आते हैं कि “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ या फिर ‘तय करो किस ओर हो तुम !’

प्रियम अंकित 
पता –
1ए – हँटले हाऊस
लॉ फैकेल्टी, आगरा कॉलेज
एम. जी. रोड
आगरा – 282010
उ. प्र.
मोबाईल – 9359976161