शुक्रवार, 12 जून 2015

भगत सिंह की शहादत और भगवा राजनीति का सच

अभी 14 फरवरी को जब बजरंगदली गुंडे प्रेम करने वाले युवक वुवतियों को देश भर में पीट रहे थे, ठीक उसी दिन सोशल मीडिया पर भगत सिंह के बहाने राष्ट्रभक्ति का राग छेड़े हुए थे। वे यह प्रचारित कर रहे थे कि जिस दिन (14 फरवरी) भगत सिंह की शहादत हुई उस दिन को प्रेम दिवस (वैलेंटाइन डे) कैसे मनाया जा सकता है। यह जानते हुए भी कि 14 फरवरी से भगत सिंह का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं, संघी लफंगई पूरे शबाब पर थी।  यह कैसे राष्ट्र भक्त हैं जो शहीदेआजम की शहादत का दिन भी नहीं जानते? कितनी खोखली है उनकी राष्ट्र भक्ति और कितना झूठा है उनका इतिहास और सामान्य ज्ञान। भगत सिंह के नाम पर प्रेमी जोड़ो की दुर्दशा करने वाले दर असल प्रेम विरोध के अपने कृत्य को भगत सिंह की आड़ में छिपा ले जाना चाहते थे। पर उनकी साजिश को इस देश का युवा मन समझता है। वह व्यक्ति जो क्रान्ति में मदद करने वाली हर चीज से बेपनाह मुहब्बत करता हो और जो तरुणाई को क्रान्ति और प्रेम का दर्शन सिखाता हो उसके नाम पर प्रेम विरोध का कृत्य अत्यंत शर्मनाक है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। प्रेम और देश भक्ति में भगत सिंह कोई अंतर्विरोध ऐसे भी नहीं देखते थे। मतवाला पत्रिका में छपे अपने एक लेख युवक में देश के नवयुवकों के बारे में उन्होने लिखा है कि –युवक ही स्वदेश की विजय- वैजयंती का सुदृढ़-दंड है। वह महासागर की उत्ताल तरंगों के समान उद्दंड है। वह महाभारत के भीष्म पर्व की पहली ललकार के समान विकराल है, प्रथम मिलन के स्फीत चुंबन की तरह सरस है।.....याद आती हैं पाश की पंक्तियाँ-प्यार करना/और लड़ सकना/जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है/धूप की तरह धरती पर खिल जाना/और फिर आलिंगन में सिमट जाना/बारूद की तरह भड़क उठना/और चारों दिशाओं में गूंज जाना-/जीने का यही सलीका होता है/प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा/जिन्हें जिन्दगी ने बनिए बना दिया/जिस्म का रिश्ता समझ सकना,/खुशी और नफरत में कभी भी लकीर न खींचना,/जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना,/सहम को चीरकर मिलना और विदा होना,/बड़ी शूरवीरता का काम होता है मेरी दोस्त,
केंद्र में भाजपाई नेतृत्त्व में बनी नई सरकार के मुखिया के के इतिहास ज्ञान से प्रेरित राष्ट्र भक्तों से यही कहा जा सकता है कि गांधी, पटेल की तरह भगत सिंह का इस्तेमाल आपके लिए बहुत घाटे का सौदा होगा। वे अपने दृष्टिकोण में इतने साफ और वैज्ञानिक हैं कि अपना वैचारिक इस्तेमाल करने के छूट नहीं देते। अगर आप राष्ट्र भक्ति और विश्वबन्धुत्त्व के कारण उनकी तरफ आकर्षित है तो एक नजर उनके विचारो की धार पर भी देना चाहिए। 1924 में प्रकाशित अपने लेख विश्वबन्धुत्त्व को परिभाषित करते हुए उन्होने लिखा कि-विश्वबन्धुता !इसका अर्थ मैं  तो संसार में समानता (साम्यवाद, world wide equality in the true sense)के अतिरिक्त कुछ नहीं समझता । और साम्यवाद भगत सिंह के लिए कोई फैशन नहीं था बल्कि  सच्चे अर्थों में वह अंतरराष्ट्रीयता वाद से प्रेरित था। बात-बात पर विश्वबंधुत्व के लिए चिल्ल-पों मचाने वालों से अलग विश्व बंधुत्त्व का एक काल्पनिक खाका उनके पास बिलकुल साफ तौर पर सुरक्षित था। वे कहते थे कि –‘ उस दिन इतनी शक्ति होगी कि शांति-शांति की पुकार भी शांति भंग न कर सकेगी। उस दिन भूख लगने पर रोटी के लिए किसी को भी चिल्ल-पों मचाने की आवश्यकता नहीं  हुआ करेगी। व्यापार उस दिन उन्नति के शिखर पर होगा, परंतु फ्रांस और जर्मनी में व्यापार के नाम पर घोर युद्ध न हुआ करेंगे। उस दिन अमेरिका और जापान दोनों होंगे, परंतु उनमें पूर्वी और पश्चिमीपन नहीं होगा.... अंग्रेज़ भी होंगे और भारतवासी भी परन्तु उस समय उनामे गुलाम और शासक का भाव न होगा। उस दिन महात्मा तालस्टाय के ‘resist not the avil’ (बुराईयों का प्रतिकार मत करो) वाले सिद्धान्त की उच्च ध्वनि न लगने पर भी संसार में बुराईयाँ नजर न आएंगी। उस समय होगी पूर्ण स्वतन्त्रता । कैसा होगा वह समय? जरा कल्पना करो। पर अफसोस कि कल्पना और विजन के बदले आजकल झूठ से काम चलाया जा रहा है।  
और आपकी राजनीति जिस धर्म की बुनियाद पर खड़ी है  और घृणा तथा सांप्रदायिकता के सहारे फलती फूलती है, उसका भगत सिंह के सपनों के भारत में कोई स्थान नहीं है। बहुत उदार और लोकतान्त्रिक बुद्धिजीवियों में भी भारत जैसे देश में धर्म को व्यक्तिगत रुचि का मामला माना जाता है। किन्तु अक्सर देखा यह  जाता है  कि व्यक्तिगत आस्था के नाम पर धर्म के भीतर से ही भेदभाव, परस्पर घृणा, कर्मकांड आदि की गुंजाईश निकाल ली जाती है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में भी धर्म की भूमिका को लेकर बहसें थीं। उन बहसों में एक पक्ष भगत सिंह का भी था। वे धर्म को व्यक्तिगत या पारिवारिक मानकर छोड़ दिये जाने के पक्ष में कदापि न थे-बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतन्त्रता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गुलामी का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है-बच्चे को हमेशा के लिए कमजोर बनाना है। उसके दिल की ताकत और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो भी हमें नजर आता है कि धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक से हो। उनमें पूंजी-पतियों के ऊंच-नीच की, छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पंडित, मौलवी जी जैसे लोग भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को जनेऊ तक देने से इंकारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की कसम ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिए, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराईयों का सुधार किया जाए। बहुत खूब ! छूत-अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाए। भेदभाव तो फिर भी रहा ही। किसी समाज में सामंती संरचना को बचाए रखने के लिए धर्म की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। जाहिर है  सामाजिक प्रगति का रास्ता बिना उस धार्मिक संरचना से मुठभेड़ किए नहीं बनाया जा सकता। तार्किकता का विकास और सच्चाई का निर्मम सामना करते हुए आलोचनात्मक चेतना का निर्माण इसका एक रास्ता हो सकता था। भगत सिंह धर्म की नब्ज को जहां से पकड़ रहे थे,वह बीसवीं ही नहीं इक्कीसवी सदी का भी सच है। पूँजीवाद से धर्म का गँठजोड़ इतने बुरे रूप में कभी सामने नहीं आया था। जिस देश में दलित मुख्यमंत्री तक के मंदिर में जाने के बाद पूरे मंदिर को धुलवाया जा रहा हो, जांच करने गए अधिकारियों को पीटा जा रहा हो उस देश में दलितो और गरीबों पर किस तरह के जुर्म धर्म की आँड में ढाए जाते होंगे, उसका अंदाजा लगानना बहुत मुश्किल है। भगत सिंह के दिखाए रास्ते पर चलने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा इस दौर में जरूरी है। पर अफसोस उसका रास्ता अंधश्रद्धा और धार्मिक कट्टरपन से होकर नहीं गुजरता । भगत सिंह यहाँ भी आपके काम के न ठहरेंगे।
जो लोग विकास का संबध अंबानी/अडानी के लाभ और  सांप्रदायिक दंगे के विकास से लगाते हो, उन्हें सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज शीर्षक लेख जरूर पढ़ना चाहिए। दंगों  के पीछे निहित धार्मिक भावनाएं , राजनतिक नेतृत्त्व की मंशा,बिके हुए मीडिया का कमाल सब पर भगत सिंह की नजर जाती है। तिलक, गोखले जिनसे कभी राजनीति सीखी, उनके दृष्टिकोण में सांप्रदायिक रुझान देख निर्मम आलोचना का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे।  मेरे एक मित्र ने बताया कि भगत सिंह ने लाजपत राय पर एक पैम्फलेट निकाला था जिसका लब्बो-लुआब यह था कि उसने चंद चांदी के सिक्कों की खातिर हमें बेच दिया। उसी लेख में भगत सिंह बताते हैं कि सांप्रदायिक दंगों की जड़ खोदे तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। ...बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है। भगत सिंह सांप्रदायिक दंगों के पीछे के अर्थशास्त्र को देख पा रहे थे इसीलिए उन्होने प्रस्तावित किया कि- लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्गचेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को यह स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं,इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति,रंग,धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारे भलाई इसी में है कि तुम धर्म,रंग, नस्ल, और राष्ट्रीयता व भेदभाव मिटाकर एक जुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नो में तुम्हारा नुकसान कुछ न होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरे कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।पूजीपतियों के खिलाफ जनता की गोलबंदी का स्वप्न वही देख सकता है जिसे देश से सचमुच का और सच्चा प्यार है। वह नहीं जो जनता को जनधन के नाम पर छले और पूजीपतियों की गोद में खेले। जनता की जमीन छीनकर उपहार देने के लिए अधिनियम पास कराए।
राष्ट्रप्रेम और त्याग की एक मात्र कसौटी यही हो सकती है कि वह निस्वार्थ हो और निश्चित उद्देश्यों के पूर्ति के लिए किया जा रहा हो। भगत सिंह से यह भी सीखा जा सकता है कि कैसे अपने मूल्यों और आदर्शो के लिए आत्मोत्सर्ग किया जा सकता है। जिन लोगों  को सत्ता के लिए हर आदर्श और मूल्य की कुर्बानी सबसे प्रीतिकर लगती हो उनका रास्ता भगत सिंह से मेल नहीं खाता। भगत सिंह ने फासी की सजा से माफी के लिए कोई अर्जी नहीं दी थी। बल्कि अपने पिता को लिखे एक पत्र में तो इस सदर्भ में पिता जी द्वारा की गई पहल पर ऐतराज जताते हुए लिखा कि-यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके विषय में बस इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है-निचल स्तर की कमजोरी। अंग्रेज़ो से माफी मांगने के एवज में भारत रत्न देने वालों से एक सवाल तो बनाता ही है कि आप भगत सिंह के वारिस कैसे हो गए?  

भारतीयता की अवधारणा और हिंदी जाति


                                                    रविभूषण



मेरे जीवन का मुख्‍य लक्ष्‍य हिंदी भाषी जनता को ऊपर उठाना है, उसे जागृत करना है, उसके ज्ञान को समृद्ध करना है। इसी के साथ स्‍वयं को शिक्षित करना है। जो बातें हम नहीं जानते, उनको जानना, अपनी जानकारी से दूसरों को लाभ उठाने का अवसर देना, इस प्रकार के लक्ष्‍य मेरे सामने बराबर रहे हैं। इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मेरा सारा प्रयत्‍न इस दिशा में है, न तो  जाति डूबे, न उसके साथ सारा देश डूबे। कला कभी भी साहित्‍य के ज्ञान कांड का स्‍थान नहीं ले सकती। मेरा कार्य जैसा भी इस ज्ञान कांड से जुड़ा है। दो समर्पित साहित्‍यकार, दो समर्पित संगीतकार, दो निष्‍ठावान कलाकार समाज में ऐसा परिवर्तन कर सकते हैं, जैसा सौ राजनीतिज्ञ मिलकर नहीं कर सकते। इसलिए अपनी विरासत से प्रेरणा लेनी चाहिए और यह विश्‍वास करना चाहिए कि निष्‍ठावान साहित्‍यकार या कलाकार की साधना कभी व्‍यर्थ नहीं जाती। (मेरे साक्षात्‍कार, पृ.254)
जातीयता और राष्‍ट्रीयता में अंतर्विरोध नहीं है। जैसे राष्‍ट्रीयता के बिना अंतरराष्‍ट्रीयता संभव नहीं है, वैसे ही जातीयता के बिना राष्‍ट्रीयता का अस्तित्‍व संभव नहीं है। फिर चाहे राष्‍ट्र एक जातीय हो या बहुजातीय। (भारतीय साहित्‍य की समस्‍याएं, 1986, पृ.39)
हिंदी प्रदेश में क्‍या होता है, उस पर बहुत कुछ निर्भर है कि सारे देश में क्‍या होता है। यह स्थिति सोलहवीं सदी में थी, 1857 में थी, 1947 में थी और आज भी है। वही, (पृ.52)
बीसवीं सदी के बीस के दशक में, जब स्‍वाधीनता आंदोलन ने एक नयी करवट ले ली थी, गांधी और भगत सिंह की दो धाराएं प्रमुख थीं, तब 1922 में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका श्री शारदा में धीरेंद्र वर्मा के चार लेख राष्‍ट्र और सूबा हिंदुस्‍तान के साथ राष्‍ट्र के लक्षणों का विवेचन करते हुए प्रकाशित हुए थे। 1930 में राष्‍ट्र या सूबा हिंदुस्‍तान शीर्षक से पुस्‍तक प्रकाशित हुई। इसी दशक में रवींद्रनाथ ठाकुर य‍ह लिख रहे थे कि भारत उनके लिए कोई भौगोलिक इकाई नहीं है। वह एक आइडिया है। रवींद्रनाथ ठाकुर के लिए भारत का नक्‍शा महत्‍वपूर्ण नहीं था। म‍हत्‍वपूर्ण थी भारत की सांस और धड़कन।
भारत नाम भरत गण से प्राप्‍त है। भरत, कुरु, पांचाल आदि अनेक गण-समाज वैदिककाल में थे। वैदिककाल में गण-संघ बन रहे थे। प्राचीन वैदिक रूप में संस्‍कृत भरत गण की भाषा है और महाभारत का युद्ध भरत गण का आपसी युद्ध है। भरत गण शक्तिशाली था। उसकी भाषा का अन्‍य गण समाजों में व्‍यवहार होने लगा था। मगध, कोसल, भरत आदि गण समाज आर्थिक केंद्र से अधिक धर्म और संस्‍कृति के केंद्र थे। भरत गण की भाषा होने के कारण संस्‍कृ‍त के अध्‍ययन और प्रसार के मुख्‍य केंद्र उत्‍तर भारत में थे। ये केंद्र उन जनपदों में रहे, जो अब हिंदी भाषी जाति के प्रदेश में हैं। डॉ.शर्मा ने इसी कारण संस्‍कृत साहित्‍य के विपुल भाग को हिंदी भाषी जाति के पूर्वजों द्वारा रचित कहा है। संस्‍कृत का केंद्र विस्‍तृत हुआ। एक केंद्र उत्‍तर में गंधार में था, जहां पाणिनि ने व्‍याकरण की रचना की और दूसरा दक्षिण के केरल में, जहां शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन का प्रचार भारतीय स्‍तर पर किया।
बीसवीं सदी के आरंभ से ही भारत को समझने-जानने, उसके वैशिष्‍ट्य को रेखांकित करने तथा अन्‍य देशों की तुलना में उसके महत्‍व बताने का सि‍लसिला प्रमुख हुआ। भारत अपनी भारतीयता के कारण भिन्‍न रहा है। इस भारतीयता को समझने-समझाने की कई कोशिशें स्‍वाधीनता-आंदोलन के दौर में हुई। भारतीयता को देखने-समझने की कई दृष्टियां हैं। एक दृष्टि जहां धार्मिक-आध्‍यात्मिक है, वहां दूसरी दृष्टि सांस्‍कृतिक है, यद्यपि इस सांस्‍कृतिक दृष्टि के अंतर्गत भी धार्मिक-आध्‍यात्मिक दृष्टि की मौजूदगी है। प्रश्‍न यह है कि भारतीयता की पहचान कबसे और कैसे की जाए ? भारतीयता को ही क्‍यों, भारत को भी क्‍यों नहीं देखने की एक तर्कसंगत, भाव-प्रमुख नई दृष्टि हो? भारत राजनीतिक इकाई से कहीं अधिक सांस्‍कृतिक इकाई रहा है। भारतीयता भारतीय राष्‍ट्रवाद और सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद से पहले की है। भारतीयता का उस तात्‍कालिकता से कोई संबंध नहीं है, जो आज चुनाव और विशेष प्रकार की पूंजी से जुड़ी है। भारतीयता का संबंध उस दीर्घकालिक संस्‍कृति से है, जो आज खतरे में पड़ी हुई है और जिसकी रक्षा की जानी चाहिए। यह संस्‍कृति सहयोग की है, एकता की है, लोकमंगल की है।
       स्‍वाधीनता-आंदोलन के दौर में भारत संबंधी गंभीर और व्‍यापक चिंतन आरंभ हुआ। अंग्रेजों ने भारत के संबंध में जो धारणा निर्मित की थी और जैसा इतिहास-लेखन किया था, उसका विरोध लाजिमी था। इतिहासकारों ने भारतीय इतिहासकारों ने भी भारत को एक सांस्‍कृतिक इकाई के रूप में देखने के प्रयत्‍न नहीं किए। सांस्‍कृतिक विकास सामाजिक विकास की समान गति न पहले थी और न आज है। सामाजिक विकास के साथ ही यहां सांस्‍कृतिक विकास भी असमान रहा है। रामविलास शर्मा इतिहासकार नहीं थे, पर उनकी इतिहास-दृष्टि किसी भी इतिहासकार की तुलना में कम महत्‍वपूर्ण नहीं है। वे सामाजिक विकास की विविध अवस्‍थाओं पर ध्‍यान देते हैं। उनके लिए महत्‍वपूर्ण यह है कि मानव-समुदाय किस सामाजिक रूप में गठित है- वह गण-समाज है, गण-संघ है, लघु जाति है, महाजन पद में बसने वाली लघु जातियों का संघ है, आधुनिक जाति है या गणों, लघु जातियों अथवा महाजातियों का कोई विशाल राष्‍ट्र है। (वही, पृ.30)। भारत को समझना और जानना आधुनिक समय में ही नहीं हुआ- महाभारत के भीष्‍म पर्व में धृतराष्‍ट्र ने संजय से भारतवर्ष के संबंध में जानना चाहा था। संजय ने उन्‍हें भारतवर्ष के बारे में बताया। डॉ. शर्मा उस समय भारत में दो तरह के समाज की बात कहते हैं। एक तरह का समाज वह है, जिसमें राजा शासक होता है; दूसरी तरह के समाज वे हैं, जिनमें कोई राजा नहीं है और जनता स्‍वयं अपनी शासन-व्‍यवस्‍था चलाती है।’ (वही)। अगर विभिन्‍न जनपद आपस में संघर्ष कर रहे होते, लड़ रहे होते तो सामान्‍य जनता का किसी प्रकार का विकास संभव नहीं था। हम जिसे सामाजिक, आर्थिक, सांस्‍कृतिक विकास कहते हैं, वह लंबे समय तक आपसी सहयोग के बिना संभव नहीं है। रामायण और महाभारत जैसी महान कृतियों में उत्‍पीड़क वर्ग का समर्थन नहीं है। देश को एकताबद्ध करने का कार्य राज्‍य-सत्‍ता से कहीं अधिक कवियों ने किया। जिस सामंत वर्ग के हाथ में राज्‍य सत्‍ता थी, वह राजनीतिक रूप से इस देश को कभी एकताबद्ध नहीं कर पाया। जिन कवियों के हाथ में राज्‍यसत्‍ता नहीं थी, वे इस देश को सांस्‍कृतिक रूप से एकताबद्ध करने में सफल हुए। सामंती व्‍यवस्‍था में संस्‍कृति के दो भाग हैं, एक कर्मकांड वाला भाग। रामायण और महाभारत की संस्‍कृति इस कर्मकांड की विरोधी है। इस सामंत विरोधी संस्‍कृति का मूल स्‍वर है भारत राष्‍ट्र की एकता। यह संस्‍कृति का दूसरा भाग है। (वही पृष्‍ठ 32)।
       भारत को देखने की दो दृष्टियां मुख्‍य रही हैं- यूरोपीय और हिंदुत्‍ववादी। यूरोपीय दृष्टि से भारत सदैव पिछड़ा था। भारत के पिछड़ेपन की अवधारणा का डॉ. शर्मा ने बार-बार खंडन किया है और अनेक तथ्‍यों, उदाहरणों से यह सिद्ध किया है कि भारत इंग्‍लैंड और यूरोप की तुलना में कई दृष्टियों से अधिक समृद्ध था। उन्‍होंने यूरोपीय और हिंदुत्‍ववादी दृष्टि दोनों का खंडन किया। रामविलासजी की चिंता में केवल हिंदी जाति नहीं थी, समस्‍त भारत था, भारतीय समाज था, भारतीय भाषाएं थीं, भारतीय साहित्‍य और संस्‍कृति थी। उन्‍होंने भारतीय इतिहास की समस्‍याओं पर मौलिक ढंग से विचार किया और हिंदी नवजागरण के साथ भारतीय नवजागरण पर भी प्रकाश डाला। वे प्रचलित अर्थों में समाजशास्‍त्री, इतिहासकार, अर्थशास्‍त्री और भाषावैज्ञानिक नहीं थे, पर इतिहास, समाजशास्‍त्र, अर्थशास्‍त्र और भाषाविज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान कम महत्‍वपूर्ण नहीं है। व्‍यवस्थित ढंग से अस्‍सी के दशक से उन्‍होंने भारत पर विचार किया। हिंदी जाति से संबंधित डॉ. शर्मा की केवल एक पुस्‍तक है हिंदी जाति का साहित्‍य (1986), पर भारत से संबंधित उनकी कई पुस्‍तकें हैं- भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्‍सवाद, खंड 1 और 2(1982), ‘भारतीय साहित्‍य के इतिहास की समस्‍याएं (1986), ‘भारतीय साहित्‍य और ऐतिहासिक भौतिकवाद(1992),भारतीय साहित्‍य की भूमिका (1996), ‘भारतीय नवजागरण और यूरोप (1996), ‘भारतीय संस्‍कृति और हिंदी प्रदेश दो खंड (1999), ‘गांधी, अंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्‍याएं (2000), ‘भारतीय सौंदर्यबोध और तुलसीदास (2001) और संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्‍याएं (2001)। अस्‍सी के दशक में ही उन्‍होंने भारतीय परिवार और नारी (1983) और पश्चिम की अस्‍वीकृति और भारतीय आधुनिकता (1981) लेख लिखे थे, जो विराम-चिन्ह (1985) में संकलित हैं।
       अस्‍सी के दशक से भारतीयता पर नए सिरे से विचार आरंभ हुआ। निर्मल वर्मा के यहां भारतीयता का अपना एक विशिष्‍ट रूप स्‍वरूप है, जिसमें स्‍मृति और परंपरा प्रमुख है। निर्मल भी भारत को मात्र भौगोलिक टुकड़ा नहीं मानते। उनके लिए ईश्‍वर और पूर्वजों की स्‍मृति महत्‍वपूर्ण है। वे नर्मदा को सहस्त्र धाराओं में फूटते देखकर जब उसे भारतीय संस्‍कृति का सबसे उजला प्रतीक कहते हैं, तो मनुष्‍य जो रचयिता है, वह प्रकृति के समक्ष गौण हो जाता है। उनके लिए भारत की आध्‍यात्मिक परंपरा महत्‍वपूर्ण है, ‘जहां आत्‍म और अन्‍य के बीच का भेद अविधा का लक्षण था, सत्‍य का नहीं।(आदि, अंत और आरंभ’, 2001, पृ.14)। निर्मल को इसका दु:ख है कि भारतीय सभ्‍यता के आध्‍यात्मिक सिद्धांत की अनदेखी की गयी। उनके अनुसार यदि भारत का सभ्‍यता बोध और सांस्‍कृतिक परंपराएं आज मौजूद हैं, तो उसका मुख्‍य कारण वह केंद्रीय आध्‍यात्मिक तत्‍व है, जिसमें इतनी क्षमता और ऊर्जा थी कि इतिहास के निर्मम थपेड़ों के बावजूद वह समस्‍त प्रभावों को अपने भीतर समाहित कर सका। (वही, पृष्‍ठ 15)। निर्मल वर्मा ने अपने एक लेख भूमंडलीकरण के दौरान भारतीय संस्‍कृति (आदि, अंत और आरंभ में संकलित) में भारतीय संस्‍कृति को वैकल्पिक दृष्टि प्रस्‍तुत करने में सक्षम-समर्थ माना है, पर उनके अनुसार हर संस्‍कृति का मूल चरित्र इस बात पर निर्भर करता है, कि उसमें मनुष्‍य का संबंध अन्‍य जैविक, प्राकृतिक, दैवी सत्‍ताओं से किस स्‍तर और रूप में प्रकट होता है। (वही, पृष्‍ठ 83)। वे जिस भारतीय संस्‍कृति को बचाना आवश्‍यक समझते हैं, वह भारतीय संस्‍कृति रामविलास शर्मा की भारतीय संस्‍कृति से भिन्‍न है। निर्मल के यहां मनुष्‍य से अधिक महत्‍व देवी-देवता और प्रकृति का है, भौतिकता से अधिक महत्‍व आध्‍यात्मिकता का है। स्‍पष्‍ट है- उनकी भारतीयता भिन्‍न है। उनका एक लेख है- क्‍यों भारतीय संस्‍कृति को बचाना जरूरी है?’ (शताब्‍दी के ढ़लते वर्षों में संकलित) वे बार-बार पश्चिमी सभ्‍यता की बात करते हैं, न कि पूंजीवादी सभ्‍यता की। यह सच है कि पश्चिमी सभ्‍यता पूंजीवादी सभ्‍यता ही है और यह पूंजीवाद, जिसे अब विश्‍व पूंजीवाद कहा जाता है, जिसका सरगना अमरीका है और अमरीकी साम्राज्‍यवाद ने जिस प्रकार संप्रदायवाद, कट्टरतावाद, आतंकवाद आदि को बढ़ावा दिया है, उधर निर्मल वर्मा का ध्‍यान नहीं है। वे भिंडरावाले की चर्चा करते हैं, जिसने अपनी सांप्रदायिक घृणा को स्‍वर्ण मंदिर की पवित्र आड़ में प्रतिपादित किया। सांप्रदायिकता के साथ सेक्‍युलरिज्‍म भी उनके लिए सहज धार्मिक मर्यादा के अपदस्‍थ और अवमूल्यित रूप हैं। निर्मल के लिए धर्म महत्‍वपूर्ण है। वे अल्‍पसंख्‍यक जातियों की जातीय अस्मिता की बात करते हैं, जबकि धर्म का जाति और जातीयता से कोई संबंध नहीं होता। उनके यहां सार्वभौमिक धार्मिक बोध प्रमुख है जिसने भारतीय जीवन-व्‍यवस्‍था को एक जीवंत इकाई के रूप में तीन हजार वर्षों से कायम रखा है। रामविलास शर्मा की विशेषता यह है कि उन्‍होंने उन ग्रंथों ऋग्‍वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, रामचरितमानस आदि को पुरातनपंथियों, पुरोहितों, धर्मांधों के हाथों में जाने से रोका। उनकी स्‍मृति और निर्मल वर्मा की स्‍मृति में फर्क है। परंपरा में जो कुछ सार्थक, श्रेष्‍ठ और मूल्‍यवान है, उसे डॉ. शर्मा ने हमारे समक्ष रखा। उन्‍होंने भारतीय समाज को निरंतरता में देखा। भारत का प्राचीन, मध्‍यकालीन और आधुनिक काल खंडों में विभाजन न कर सामाजिक गठन को मुख्‍य माना। उनके अनुसार हिंदी प्रदेश में बसने वाली जाति प्राचीन गणोंऔर सामंतयुगीन लघु जातियों के परस्‍पर घनिष्‍ठ संपर्क का परिणाम है। इस प्रदेश का इतिहास सारे देश के इतिहास को प्रभावित करता रहा है। अशोक, समुद्रगुप्‍त, हर्ष और पृथ्‍वीराज चौहान के युगों के बाद अकबर और औरंगजेब के जमाने तक हिंदी प्रदेश का इतिहास समस्‍त भारतीय इतिहास को प्रभावित करता है। (भारतीय साहित्‍य की समस्‍याएं, पृ.40)।
       रामविलास शर्मा ने वैदिक काल से लेकर ग्‍यारहवीं सदी तक को सामंती व्‍यवस्‍था का समय कहा है। तमिल भाषा का प्राचीनतम साहित्‍य, सामंती व्‍यवस्‍था का ही साहित्‍य है। सामंती व्‍यवस्‍था और वैदिक-पौराणिक धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्मों का प्रसार एक अविरल भारतीय प्रक्रिया है। भारत का जो भी प्रदेश सामंती व्‍यवस्‍था में प्रवेश करता है, वह उस प्रक्रिया से अभिन्‍न रूप में संयुक्‍त हो जाता है। भारतीय समाजों के सामंतीकरण की जो प्रक्रिया उत्‍तर भारत में घटित होती है, वही तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत में घटित होती है। इस प्रक्रिया का प्रधान माध्‍यम संस्‍कृत थी, तमिल साहित्‍य का कोई ऐसा युग नहीं है, जब उसके रचयिताओं का संपर्क संस्‍कृत अथवा पाली अथवा प्राकृत से न रहा हो। (वही,पृ.80)। जहां तक भारत में जातीय गठन की प्रक्रिया का प्रश्‍न है, बारहवीं सदी से नयी जातियों का निर्माण होता है, जिनमें एक हिंदी जातिभी है। पहली बार सुचिंतित-सुविचारित रूप में डॉ. शर्मा ने हिंदी जाति की अवधारणा प्रस्‍तुत की। जाति के महत्‍व से हिंदी के प्रमुख लेखक सुपरिचित थे। भारतेंदु ने जातीय संगीत पर विचार किया था। भारत की भाषा-समस्‍या (1949) लेख से लेकर दो खंडों में प्रकाशित पुस्‍तक भारतीय संस्‍कृति और हिंदी प्रदेश (1999) तक के पचास वर्षों में उन्‍होंने हिंदी जाति पर विशेष ध्‍यान दिया, जातीय एकता की बात की क्‍योंकि किसी भी जाति के एकताबद्ध होने की प्रक्रिया साम्राज्‍य विरोधी प्रक्रिया भी होती है। राष्‍ट्रीय एकता के लिए आवश्‍यक है कि राष्‍ट्र की प्रत्‍येक जाति स्‍वयं भी एकताबद्ध हो। (भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्‍सवाद, खंड 2, 1982, पृ.234)  जाति पर आज भी विचार करने वाले व्‍यक्ति साम्राज्‍य विरोध को भूल जाते हैं। अभय कुमार दुबे ने अपने लेख मैं और वे के बीच रामविलास शर्मा का ज्ञान कांड ( तदभव, अक्‍टूबर 2012) में लिखा है कि वे इतिहासलेखन-संबंधी अपनी मौलिक अंतर्दृष्टियों में इरफान हबीब के पूर्ववर्ती हैं, भारत की प्राक् औपनिवेशिक आधुनिकता के संधान में भारत का अर्ली माडर्न खोजने वाली इतिहासकार मंडली के पूर्ववर्ती हैं, सामाजिक आधार पर भाषा के विकास की जांच-पड़ताल करने में सोशल लिंग्विस्टिक्‍स की प्रतिष्‍ठा के पूर्ववर्ती हैं, पर दुबे रामविलास शर्मा के साम्राज्‍यवाद के विरोध की अपने लंबे लेख में चर्चा तक नहीं करते। इसके विपरीत वे हिंदी जाति की थीसिस को वर्चस्‍व की रक्षाकहते हैं, जो गलत है। दुबे यह स्‍पष्‍ट नहीं करते कि वे कौन हैं, जिसकी चर्चा डॉ. शर्मा ने उनके लेख के आरंभ के उद्धरण में की है। वे को अमूर्त बनाए रखने से किसका लाभ है। रामविलास शर्मा ने जिसे वे कहा है, वह साम्राज्‍यवाद है उससे जुड़ी हुई संस्‍थाएं और उन संस्‍थाओं से जुड़े बुद्धिजीवी हैं। उन्‍होंने फोर्ड फाउंडेशन का नाम लिया है।
       भारतीय संस्‍कृति से रहित किसी भारतीयता की कल्‍पना क्‍या की जा सकती है। जिसे हम भारतीय संस्‍कृति कहते हैं, वह आखिर है क्‍या ? भारतीय संस्‍कृति यहां की जातीय संस्‍कृतियों से अलग हटकर कोई चीज नहीं है।हिंदी भाषी क्षेत्र में बंगाल, महाराष्‍ट्र और तमिलनाडु की अपेक्षा जातीय चेतना कम है। जब तक जातीय चेतना की कड़ी को नहीं पकड़ा जाएगा, हिंदी जाति को संगठित नहीं किया जाएगा, हिंदी भाषा के सारे जनपदों को मिलाकर एक बड़ा राज्‍य नहीं बनाया जाएगा, तब यहां जातीय विकास नहीं हो सकता। (मेरे साक्षात्‍कार’, 330-43) भाषा और समाज (1961), ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण (1977), ‘हिंदी जाति का साहित्‍य (1986), ‘भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्‍सवाद खंड 1 (1982), ‘भारतीय इतिहास और ऐतिहासिक भौतिकवाद (1992) तथा भारतीय संस्‍कृति और हिंदी प्रदेश खंड 1 और 2 (1990) के अतिरिक्‍त अनेक साक्षात्‍कारों में जाति तथा हिंदी जाति पर उनके विचार मौजूद हैं। डॉ. शर्मा के जाति-संबंधी कई विचार मार्क्‍स, एंगेल्‍स, लेनिन तथा स्‍तालिन के जाति-संबंधी विचारों से आगे हैं। उन्‍होंने हिंदी जाति का अस्तित्‍व स्‍थापित किया और खुसरो-विद्यापति के समय से  जाति की निर्माण-प्रक्रिया पर विचार किया। उन्‍होंने सोदाहरण यह प्रमाणित किया है कि सामंती समाज में लघु जातियों का निर्माण होता है और पूंजीवादी समाज में महाजाति का निर्माण होता है। मार्क्‍सवाद में जातीय गठन और निर्माण औद्योगिक पूंजी से जुड़ा है, पर डॉ. शर्मा ने कोस्मिन्‍स्‍की, स्‍तालिन और एंगेल्‍स से कुछ सूत्र पकड़कर जातीय गठन पर विचार किया और इसकी प्रक्रिया में व्‍यापारियों की मुख्‍य भूमिका मानी। व्‍यापारिक पूंजीवाद उनके अनुसार जातीय निर्माण का मुख्‍य कारक है। हिंदी जाति की अवधारणा साम्राज्‍यवादी, सामंतवादी और संप्रदायवादी शक्तियों के लिए नुकसानदेह है। डॉ. शर्मा जातीय चेतना को केवल भाषागत, प्रदेशगत चेतनानहीं मानते। वे इसमें साम्राज्‍य विरोध के साथ सामंती रूढि़यों के विरोध और समाज को पुनर्गठित करने की अवधारणाओं को शामिल करते हैं। वे आजीवन हिंदी की जातीय एकता की बात करते रहे और उनके निधन से कुछ महीनों के बाद ही हिंदी के तीन प्रदेशों को तोड़कर तीन नए राज्‍य बनाए गए। 1857 से सबक लेकर अंग्रेजों ने हिंदीभाषी इलाके को कई टुकड़ों में बांटा। आगरा और दिल्‍ली को अलग किया। 1953 में ही डॉ. शर्मा ने हिंदीभाषी इलाके के एक होने की बात कही थी।
       महत्वपूर्ण यह है कि डॉ. शर्मा का हिंदी जाति-संबंधी चिंतन स्‍वतंत्र भारत में विकसित हुआ। साम्राज्‍यवाद से जारी संघर्ष समझौते में बदल चुका था और यह समझौता बाद के दिनों में आत्‍मघाती सिद्ध होगा, इसे वे समझ चुके थे। साम्राज्‍यवाद से सहयोग कर और संबंध स्‍थापित कर भारत विकास नहीं कर सकता था। रामविलास शर्मा की  हिंदी जाति की अवधारणा, भारतीयता की अवधारणा से जुड़ी हुई है। बंगाल के विभाजन (1905) के बाद बंगाल के बुद्धिजीवियों ने जाति पर विशेष ध्‍यान दिया। नवंबर 1911 के माडर्न रिव्‍यू में श्‍यामाचरण गांगुली ने भारत की सभी जातियों की एकता की आवश्‍यकता बताई थी। उन्‍होंने हिंदुस्‍तानी जाति की एकता की बात कही थी। श्‍यामाचरण गांगुली ने बंगाली प्रश्‍न को भारतीय प्रश्‍न बना दिया था। बीसवीं सदी के आरंभ में जातीय प्रश्‍न बनाने की कोशिश की। जातीयता और भारतीयता में कोई अलगाव नहीं है। भारत की सभी जातियों का संयुक्‍त होना क्‍या ब्रिटिश भारत में ही आवश्‍यक था। स्‍वतंत्र भारत में क्‍या यह आवश्‍यक नहीं है? जातीयता का विकास क्‍या केवल अंग्रेजों ने रोका था? आज के भारत में भारतीय जन को एकजुट होने से रोकने वाली शक्तियां प्रमुख हैं या नहीं। हिंदी जाति भारत की बहुसंख्‍यक जाति है। इसकी एकता साम्राज्‍यवादी शक्तियों और उनके सहयोगियों-अनुचरों को कभी रास नहीं आ सकती। आज हिंदी जाति पर केवल एकेडमिक ढंग से विचार नहीं किया जा सकता। हिंदी प्रदेशों में आज जिस तरह का रूढि़वाद, अंधविश्‍वास, जाति-बिरादरी, संप्रदायवाद है, क्‍या वह स्‍वागत योग्‍य है ?  हिंदी जाति का अपना सांस्‍कृतिक इतिहास है। डॉ. शर्मा इस सांस्‍कृतिक इतिहास की, समृद्ध, गौरवशाली परंपरा को सामने रखकर हमें प्रेरित करते हैं। अंग्रेजों के समय ही नहीं, स्‍वतंत्र भारत में भी इसकी ( हिंदी प्रदेश की) कम उपेक्षा नहीं हुई है, जबकि सर्वाधिक प्रधानमंत्री हिंदी प्रदेश के ही थे।
       बीसवीं सदी में राष्‍ट्रवाद प्रमुख था। अंतिम तीन दशकों में दृश्‍य बदलने लगा और बाजारवाद प्रमुख हो गया। हिंदी प्रदेश पहले भी पिछड़ा था। वह आज भी पिछड़ा है। जातीय चेतना के विकास के बिना यह पिछड़ापन दूर नहीं होगा। डॉ. शर्मा के अनुसार  प्रदेश में जातीय चेतनाका अभाव उसके राजनीतिक पिछड़ेपन का प्रमाण है। विदेशी पूंजी-प्रवाह का डॉ. शर्मा ने सदैव विरोध किया और उसके बाद हिंदी प्रदेश सहित समस्‍त भारत में समस्‍याएं और विकट हो गयी हैं। हिंदी प्रदेश भारत का हृदय प्रदेश है। य‍ह किसी भी भाषाई क्षेत्र से बड़ा है। इसकी जनसंख्‍या देश की कुल आबादी के पैंतालीस प्रतिशत से अधिक है। जहां एक ओर इसे पिछड़ा बनाए रखने के सारे प्रयास किए गए, वहां रामविलास शर्माजी ने बार-बार जातीय चेतना, जातीय स्‍मृति आदि की बात कर इसे स्‍वस्थ बनाने के प्रयत्‍न किए। हिंदी प्रदेश में जनपदीय अलगाव बहुत है और जाति-बिरादरी के बंधन सुदृढ़ हैं। अब भोजपुरी, मैथिली, छत्‍तीसगढ़ी आदि बोलियां अपने को स्‍वतंत्र भाषाएं कह रही हैं। पृथकतावादी समूह अस्‍सी के दशक से बढ़े हैं। छत्‍तीसगढ़ जब तक मध्‍य प्रदेश के अंतर्गत था, वहां की भाषा हिंदी थी। अब वहां सरकारी कामकाज की भाषा छत्‍तीसगढ़ी है। पहले हिंदी -उर्दू का विभेद था। अब हिंदी और उसकी बोलियों के बीच विभेद है। आठवीं अनुसूची में भोजपुरी, राजस्‍थानी शामिल हो, इसके लिए प्रयत्‍न जारी हैं। जातीय चेतना गौण और जनपदीय चेतना प्रमुख। सच्‍चाई यह है कि जनपदीय चेतना भी नहीं है। विदेशी पूंजी, जिसकी सदैव रामविलास शर्मा ने आलोचना की, सभी क्षेत्रों में फैलकर कोहराम मचा रही हैं। भारत अन्‍य देशों से भिन्‍न है। यह बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्‍कृतिक देश है। इसकी विेशेषता विविधता में एकता की रही है। इस एकता को खंडित करने के प्रयत्‍न अब अनेक स्‍तरों पर चल रहे हैं। इसी दौर में 80 के दशक से डॉ. शर्मा साहित्यिक आलोचना-कर्म छोड़कर समाज-चिंतन और इतिहास-लेखन की ओर मुड़े।
मार्क्‍सवादी विचारकों ने जाति और राष्‍ट्रीयता को एक माना था। डॉ. शर्मा का मत उनसे भिन्‍न है। उनके अनुसार व्‍यापारिक पूंजी के दौर में जाति बनती है, उसका गठन होता है और औद्योगिक पूंजी के दौर में राष्‍ट्रीयता का जन्‍म होता है। इस प्रकार जाति का अस्तित्‍व राष्‍ट्रीयता के पूर्व है। उन्‍होंने भारतीय समाज को कभी स्थिर, जड़ और अपरिवर्तनशील नहीं माना। अस्‍सी के दशक से और मुख्‍यत: 1991 से, जब भारत में नवउदारवादी अर्थव्‍यवस्‍था अपना ली, सांप्रदायिकता, अंध राष्‍ट्रवाद, जाति विद्वेष, हिंदुत्‍ववाद, आतंकवाद-सब तीव्र गति से आगे बढ़ा है। इसी दौर में डॉ. शर्मा ने ऋग्‍वेद की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी कि वहां शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम में कोई भेद नहीं है। उन्‍होंने इसे केवल अतीत नहीं माना, अपितु यह भी लिखा कि हमें इसी भविष्‍य की ओर जाना है। आज शारीरि‍क श्रम करने वाले किसानों और मजदूरों की क्‍या स्थिति है? जो सचमुच मानसिक श्रम करने वाले हैं, उनकी संख्‍या कितनी है। डॉ. शर्मा ने स्‍वयं शारीरिक एवं मानसिक श्रम दोनों किया। हिंदी जाति संबंधी उनकी अवधारणा में कइयों ने अंध हिंदी राष्‍ट्रवाद देखा है, जो गलत है। हिंदी जाति को हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों ने भी कम स्‍वीकारा है। इस पर सवाल खड़े किए हैं। डॉ. शर्मा के लिए केवल हिंदी जाति महत्‍वपूर्ण नहीं थी। भारतीय राष्‍ट्र का उनके लिए अधिक महत्‍व था। स्‍वतंत्र भारत की राजनीति, अर्थनीति, संस्‍कृति नीति आदि को सामने रखकर भी हिंदी जाति पर विचार करने की अधिक आवश्‍यकता है। प्रत्‍येक अवधारणा समय-समाज सापेक्ष होती है। हिंदी जाति की अवधारणा में हिंदी-उर्दू दोनों भाषाएं शामिल हैं। पी.सी. जोशी ने जब अवधारणाओं का संकट की बात की थी, उसके पहले डॉ. शर्मा हिंदी नवजागरण और हिंदी जाति की अवधारणा दे चुके थे। उनकी चिंता में सदैव वर्तमान भारत था। जिस दिशा में इसे ले जाया जा रहा था, उस पर उनकी बड़ी पैनी नजर थी, जिसे हम उनके अमरीकी साम्राज्‍यवाद विरोध और विदेशी पूंजी के विरोध में देखते हैं। सोवियत रूस के विघटन के पहले ही अस्‍सी के दशक के आरंभ से पुनरुत्‍थानवाद, संप्रदायवाद और आतंकवाद फैलने लगा था। 1982 में जब अंतरराष्‍ट्रीय मुद्राकोष से 5 बिलियन डॉलर कर्ज लिया गया, उसके पहले क्‍या यह सब मौजूद था, सशक्‍त था ?
भारतीयता पर विचार करने वाले लेखक और बुद्धिजीवी तथा हिंदी जाति की आलोचना करने वाले अपने समय के अमरीकी साम्राज्‍यवाद पर विचार नहीं करते हैं, विदेशी पूंजी से विदेशी संस्‍कृति को जोड़कर नहीं देखते हैं। वे साम्राज्‍यवाद, संप्रदायवाद, कट्टरतावाद और आतंकवाद पर कम विचार करते हैं। भारतीय संस्‍कृति का जिस श्रम संस्‍कृति से गहरा रिश्‍ता है, वह श्रम विरोधी पूंजी और लफंगी आवारा पूंजी से कैसे प्रभा‍वित होता है, उस ओर भी उनका ध्‍यान नहीं जाता। डॉ. शर्मा के लिए हिंदी जाति का महत्‍व इसलिए है कि इस जातीय एकता से भारतीय एकता भी बनी रहेगी। स्‍वाधीनता आंदोलन में यह भारतीय एकता थी, आज के भारत में जातीय एकता और भारतीय एकता की जरूरत है या नहीं ? बौद्धिक उपनिवेशवाद और सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद की काट है हिंदी जाति। आज एक जाति को दूसरी से लड़ाने के प्रयत्‍न जारी हैं। राष्‍ट्रीय एकता बीते दिनों की बात है। राष्‍ट्र राज्‍य के स्‍थान पर कॉरपोरेट राज्‍य बन रहा है। सत्‍ता और व्‍यवस्‍था को न भारतीय भाषाओं की चिंता है न भारतीय जन की। जो दृश्‍य है, वह हमारे सामने है। ऐसी स्थिति में जरूरी क्‍या है ? हिंदी जाति की एकता से खतरा किसे है। हिंदी समाज को जातिवाद, संप्रदायवाद, हिंदूवाद में फंसकर नष्‍ट हो जाना चाहिए या जातीय चेतना को विकसित करना चाहिए ? रामविलास शर्मा हिंदी भाषी जनता के भविष्‍य और भारत के भविष्‍य को लेकर सदैव चिंतित, सक्रिय और सृजनरत रहे। उनका महत्‍व केवल अकादमिक क्षेत्र में ही सीमित नहीं हो सकता।
 (बहुबचन से साभार)