विख्यात कन्नड़ साहित्यकार प्रो. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ जन संस्कृति मंच का बयान
प्रो. कलबुर्गी की हत्या की अविलंब जांच कराई जाए और हत्यारों को दण्डित किया जाए: जसमप्रो. एमएम कलबुर्गी, का. गोविंद पनसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर के विचारों से जनता को अवगत कराने का निर्णय
नई दिल्ली: 2 सितंबर 2015
कन्नड़ भाषा के विख्यात विद्वान और लिंगायत मत के विश्वविख्यात विशेषज्ञ साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता 77 वर्षीय प्रो. एम. एम. कलबुर्गी की 30 अगस्त को कर्नाटक के धारवाड़ जिले में उनके घर पर गोली मारकर हत्या कर दी गयी। पुणे और कोल्हापुर में डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर और कामरेड गोविंद पंसारे जैसे अंधविश्वासविरोधी कार्यकर्ताओं और विद्वानों की हत्या के बाद अब धारवाड़ में प्रो. कलबुर्गी की हत्या इसका स्पष्ट संकेत है कि भारत एक ‘अंधे युग’ में प्रवेश कर गया है, जहां तर्कशीलता, प्रगतिशीलता और धार्मिक-सामाजिक सुधार की सारी वैचारिक परपंराएं खतरे में हैं, बर्बर अंधधार्मिक, सांप्रदायिक हत्यारे धर्मसत्ता और राजसत्ता के संरक्षण में बेखौफ घूम रहे हैं। जिस देश में मूर्तिपूजा के विरोध की ताकतवर वैचारिक परंपरा रही है, वहां प्रो. कलबुर्गी जैसे मूर्तिपूजा विरोधी विद्वान की हत्या दरअसल अपनी परंपरा के प्रगतिशील पहलू की भी हत्या है।
सन 2014 में कर्नाटक सरकार द्वारा ‘अंधश्रद्धा विरोधी विधेयक’ पर बहस में भाग लेते हुए श्री कलबुर्गी द्वारा मूर्ति-पूजा के विरोध में कही गयी बातों के खिलाफ उन्हें विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने धमकियां दी थीं। कुछ समय तक उन्हें पुलिस सुरक्षा भी सरकार ने उपलब्ध कराई थी। श्री कलबुर्गी कई दशकों से कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे थे। 1989 में उनकी लिखी एक पुस्तक में लिंगायत मत के संस्थापक संत बसवेश्वर (जिन्होंने स्वयं अंधश्रद्धा, जाति-प्रथा, साम्प्रदायिक और लैंगिक भेद-भाव के विरुद्ध 12वीं सदी में ही युद्ध छेड़ा था) के जीवन-प्रसंग से सम्बंधित दो अध्यायों को उन्हें कट्टरपंथियों के दबाव में वापस लेना पड़ा था। इस घटना पर व्यथित होकर उन्होंने कहा था कि ‘मैंने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए यह किया, लेकिन इसी दिन मेरी बौद्धिक मृत्यु हो गयी।’ पिछले दिनों तमिल लेखक मुरुगन ने भी ऐसे ही हादसे से गुजरते हुए अपने लेखक की मौत की घोषणा की थी। प्रो. कलबुर्गी की हत्या पर बजरंग दल के एक प्रतिनिधि भुवेश शेट्टी ने तो ट्विटर पर हर्ष भी ज्ञापित किया और साथ ही एक अन्य बड़े कन्नड़ लेखक के.एस. भागवान को अगला निशाना घोषित किया।
जन संस्कृति मंच का यह मानना है कि हिन्दुत्ववादी उपद्रवियों के खिलाफ आतंक के कई मामलों में मुकदमों को कमजोर कर रही मोदी सरकार के आने के बाद संघी दहशतगर्दों के हौसले लगातार बढ़ रहे हैं। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार दाभोलकर हत्या की जांच के लिए सीबीआई को जरुरी स्टाफ तक मुहैया नहीं करवा रही है। मोदी सरकार और उसकी जांच एजेन्सियां तीस्ता शीतलवाड़ जैसे सांप्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न कर रही हैं। ओड़ीशा में हेतुवादी आंदोलन के नेताओं को संघी लगातार खुलेआम धमका रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी सांप्रदायिकता विरोधी और प्रगतिशील विचारों वाले कार्यकर्ताओं को संघियों की धमकियां लगातार मिलती रहती हैं। जन संस्कृति मंच न सिर्फ ऐसी घटनाओं की भर्त्सना करता है बल्कि तमाम प्रगतिशील-जनवादी सांस्कृतिक शक्तियों से अपील भी करता हैं कि इस मुल्क की धर्मनिरपेक्षता को सुरक्षित रखने और बुलंद करने के लिए साझा कार्यवाहियों के सिलसिले को तेज करें।
हमारी मांग है कि प्रो. कलबुर्गी की हत्या की बिना देर किये जांच कराई जाए और हत्यारों को दण्डित किया जाए, और साथ ही संघी दहशतगर्द संगठनों की फंडिग और उनकी ट्रेनिंग आदि की जांच विस्तार से कराने के लिए कदम उठाए जाएं। तमाम संघी आतंकी मुकदमों को एनआईए द्वारा कमजोर करने की साजिशों को रोकने के लिए न्यायपालिका तत्काल पहल ले।
जन संस्कृति मंच ने प्रो. कलबुर्गी के लेखन के साथ-साथ शिवाजी पर कामरेड गोविंद पंसारे की पुस्तक के अंशों और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर के कार्यों पर केंद्रित विचार गोष्ठियों और नाट्य प्रस्तुतियों के जरिए उनके विचारों से जनता को अवगत कराने का भी निर्णय लिया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके विचारों के महत्व को समझें और यह निर्णय करें कि इन बुर्जुग विद्वानों की हत्या करके हत्यारों ने समाज और देश को कितना भारी नुकसान पहुंचाया है। देश भर में प्रो. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ हो रहे संयुक्त विरोध प्रदर्शन दरअसल इसी बात का संकेत दे रहे हैं कि हत्या के बल पर विचारों को रोकने का हत्यारों का मकसद सफल नहीं होगा। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयां इस तरह के विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहेंगी और इस साझी लड़ाई को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाएंगी।
जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी
संपर्क- 09958672277

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