बुधवार, 22 जुलाई 2015

लेखक संगठन, सांस्कृतिक आंदोलन और प्रेमचन्द

प्रेमचंद हिन्दी भाषा की उन्नति और समृद्धि के प्रतीक हैं। लेकिन वे भाषा के माध्यम से भेद फैलाने के हरदम खिलाफ रहे। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने प्रेमचंद को शांतिनिकेतन आमंत्रित किया था एक पत्र लिखकर। उस पत्र में उन्होने लिखा था कि ‘आपके साहित्य ने हिन्दी को समृद्ध किया  है और हिन्दी भाषियों को दुनिया में मुंह दिखाने लायक। इसीलिए आपके यश को हम लोग निर्विचार बाँट लिया करते हैं। जब हम रंगभूमि या कर्मभूमि को दूसरों को दिखाते हैं तो मन ही मन गर्व पूर्वक पूछा करते हैं –है तुम्हारे पास कोई ऐसी चीज!और इस प्रकार का गर्व करते समय हमें प्रेमचंद नामक किसी अज्ञात अपरिचित व्यक्ति की याद भी नहीं रहती-मानो सब कुछ हमारी ही कृति हो।’ वे सचमुच बड़े लेखक थे, इसलिए कि एक लेखक के सरोकार क्या हैं,  उसे जानते थे। बनारस उनका प्रिय शहर था। उन्हीं के शब्दों में कहें तो ‘कदासतपरस्ती (रूढिवादिता) का अड्डा’। उसने उनकी मदद भी की। रूढ़ियों को समझने में। पर तरक्कीपसंदगी की जो शमा उन्होने रोशन की उससे रूढ़िवादिता के खिलाफ एक जनपक्षधर माहौल तैयार हुआ। एक पत्र में उन्होंने लिखा कि- ... ‘मुझपर यह दोष लगाया है कि मैं ब्राह्मण वर्ग का द्रोही हूँ सिर्फ इसलिए कि मैंने इन पुजारियों और महंतों और धार्मिक लुच्चे-लफंगों के कुछ पाखंडों का मज़ाक उड़ाया है। उनको वह ब्राह्मण कहता है  और जरा भी नहीं सोचता कि उनको ब्राह्मण कहकर वह अच्छे भले ब्राह्मणों का कितना अपमान करता है। ब्राह्मण का मेरा आदर्श सेवा और त्याग है,वह चाहे कोई भी हो। पाखंड और कट्टरता और सीधे साधे  हिन्दू समाज के अंधविश्वास का फायदा उठाना इन पुजारियों और पंडों का धंधा है और इसीलिए मैं उन्हें हिन्दू समाज का एक अभिशाप समझता हूँ और उन्हें अपने अधःपतन के लिए उत्तरदायी समझता हूँ। वे इसी काबिल हैं कि उनका मखौल उड़ाया जाए और यही मैंने किया है। यह निर्मल और उसी थैली के चट्टेबट्टे दूसरे लोग ऊपर से बहुत राष्ट्रीयता वादी बनाते हैं मगर उनके दिल में पुजारी वर्ग की सारी कमजोरियां भारी पड़ी है और इसीलिए वे हमलोगों को गालियां देते हैं जो स्थिति में सुधार लाने की कोशिश कर रहे है।’ प्रेमचंद आज होते तो क्या कहते जब देखते कि ‘सुधरी हुई स्थितियों’ को इस देश का प्रधानमंत्री शीर्षासन कराने पर आमादा है। वह गंगा के तट पर बैठकर आरती कराता है और निर्मल गंगा के नाम पर पाखंडी और भ्रष्ट पंडों पुरोहितों को अंधविश्वास और कर्मकांड का खुला खेल खेलने के लिए प्रोत्साहित करता है।            

जद्दोजहद, परेशानियां, तकलीफ दुख हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा होते हैं। एक लेखक का जीवन तो और ज्यादा इन चीजों से घिरा रहता है। पर अपने ‘स्व के सुख’ की चिंता से दूर जो जीवन रचना के केंद्र में हैं, उसको बेहतर बनाने की कल्पना हर रचनाकार करता है। इस प्रक्रिया में भी उसे द्वंद्व  से गुजरना पड़ता है। इन द्वन्द्वों का विसर्जन करके ही वो नई मशाले जला पाता है। प्रेमचंद का लेखकीय दायित्त्वों के प्रति समर्पण इसका उदाहरण है। लिखना उनके लिए कोई निजी कार्यवाही नहीं थी। हिन्दी क्षेत्र में एक बड़े लेखक की अपने लेखन से क्या अपेक्षा और आकांक्षा थी -इसका पता हमें बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे एक पत्र से चलता है- ‘बात यह है कि अभी तक साहित्य को हम व्यवसाय के रूप में ग्रहण नहीं कर सकते। मेरा जीवन तो आर्थिक रूप से असफल है और रहेगा। ‘हंस’ निकालकर मैंने किताबों की बचत का भी वारा न्यारा कर लिया। ...मेरे आकांक्षाए कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है हम स्वराज्य संग्राम में विजयी हो। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खाने भर को मिल ही जाता है। मोटर और बंगले की मुझे हविश नहीं। हाँ, यह जरूर चाहता हूँ कि दो-चार ऊंची कोटि की पुस्तकें लिखूँ पर उनका उद्देश्य स्वराज्य विजय ही है।’ लेखन उनके लिए कोई आय का जरिया न था। उदात्त समर्पण देश की आजादी के प्रति साफ दिखता है इन शब्दों में। हिन्दी में लिखने की दुश्वारिया समझते थे। अपने मित्रों को अङ्ग्रेज़ी में लिखने का सुझाव भी देते थे। पर खुद उस भाषा को माध्यम बनाया जिससे देश सेवा की जा सकती हो, आमदनी नहीं।

आज हिन्दी समाज में संगठित लेखन, सांस्कृतिक आंदोलन, को बड़ी हिकारत से देखा जा रहा है। हर कोई लेखक संगठनों को गाली देते हुए उनके निकम्मेपन के बारे में फतवे जारी कर देता है। संगठन बनाना वह भी वैचारिक आधार पर बहुत मुश्किल काम होता है। लेनिन ने तो उसकी तुलना ‘ मेढक तौलने’ से की थी। संगठनो के बारे में हिन्दी क्षेत्र के भीतर एक भ्रांति और फैलाई गई है। वह यह कि यहाँ सारे निर्णय ‘ऊपर से’ थोप दिए जाते है। लेखक संगठन बस उसका पालन कराते हैं जो उन्हें बताया जाता है। एक बात यह भी अक्सर सुनने में आती है कि लेखक का काम लिखना है संगठन बनाने का काम दूसरे लोगों का है। प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन का अध्यक्ष बनाना स्वीकार किया था। किन्तु उसके बहुत पहले से वे हिन्दी परिषद के जलसों में जाते रहे थे। संगठन बेहतर कैसे हो, इसकी चिंता भी उन्हें थी। प्रलेस की स्थापना के लिए एक बैठक इलाहाबाद में हुई थी। 28 नवंबर 1934 को जैनेन्द्र कुमार को एक पत्र में उन्होने लिखा कि-‘ प्रयाग में लेखक संघ का विवरण तुम्हें मिल गया होगा। बहुत से साहित्यिक उसमें मिल गए हैं, लेकिन दिमाग वाला आदमी अभी तक नजर नहीं आता। यूं हमारे यहाँ दिमाग वाले हैं ही कितने। तुम इस संघ में आ मिलो और ऐक्टिव इन्टरेस्ट लो तो शायद कुछ हो। मेरा नाम सभापति के लिए पेश किया गया है। मेरा नाम सभापति के लिए पेश किया गया है। मेरे जैसा सभापति जिस संस्था का हो वह क्या होगी। मैंने डॉ भगवान दास, पंडित वेंकटेश नारायण तिवारी या पंडित नरेन्द्रदेव जी का नाम प्रपोज किया है।’ प्रेमचंद यह समझते थे कि बड़ा लेखक अगर ऐक्टिव इन्टरेस्ट लेगा तो उससे संगठन और लेखक दोनों का फायदा होगा। यह जरूर है कि लेखक संगठनों में तमाम लेखक ‘निष्क्रिय इन्टरेस्ट’ से रहते हुए संगठन के लिए और अपने लिए भी मुश्किल खड़ी कर लेते है। मुक्तिबोध के शब्द लेकर कहूँ तो ‘मानो मेरे निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया, मानो मेरे कारण ही दुर्घट/ हुई यह घटना।’ ऐसा ही एक पत्र उन्होने बनारसी दास चतुर्वेदी को भी लिखा था जिसमें हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक संगठन के काम-धाम और उसकी सक्रियता के क्षेत्रों की चर्चा की थी।  
अपने सभापतितत्व को लेकर जरूर प्रेमचंद के मन में संशय था।  जिन दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना का प्रयास चल रहा था, सज्जाद जहीर लगातार प्रेमचंद के संपर्क में थे। इसके गवाह है प्रेमचंद और सज्जाद जाहीर के बीच के पत्राचार। इन पत्रों से प्रेमचंद की एक दूसरी ही तस्वीर उभर कर सामने आती है। दिल्ली में लेखको की एक सभा कायम की थी प्रेमचंद ने। सज्जाद जहीर को इसकी जानकारी देते हुए लिखा कि- ‘हमने देहली में एक हिंदोस्तानी सभा कायम की है जिसमें उर्दू और हिंदी के अहले अदब (साहित्यकार) बाहम तबादलए-खयालात (पारस्परिक विचार विनिमय)कर सके। सियासी मुदब्बिरों ने जो काम खराब किया है उसे अदीबों को पूरा करना पड़ेगा,अगर सही किस्म के अदीब पैदा हो जाए।’ ऐसे ही नहीं कहा था प्रेमचंद ने कि-साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। उसका पूरा नक्शा भी बना रखा था। राजनीति की हर दक़ियानूसी को वे साहित्य और संस्कृतिकर्म के सहारे दूर करना चाहते थे। उसके जरूरी सामान अच्छे साहित्य और संगठन के भीतर वे देख पा रहे थे। उसी पत्र में लिखा कि-‘पहले हम खुद ता वाजे तौर पर (स्पष्ट रूप से) समझ लें कि हम लिटरेचर को किस तरफ ले जाना चाहते हैं, जभी हम दूसरों को रास्ता दिखा सकते हैं। जब हमें तबलीग (प्रचार)करना है तो उसके लिए असलाहे से मुसल्लेह (शस्त्र सज्जित) होना पड़ेगा।’ सज्जाद को लिखे तीसरे पत्र में उन्होने संगठन को निचले स्तर तक ले जाने की जरूरत बल देते हुए लिखा कि- बेशक मक़ामी कमेटियों से मुस्तकिल और जिंदा (स्थाई और जाग्रत) दिलचस्पी कायम रहेगी। देहली कि हिंदोस्तानी सभा का मकसद सिर्फ इत्तेहाद (एकता) और एक मुश्तरक जबान (साझी भाषा) की तहरीक को कायम रखना है। 
इन सभी पत्रों में सबसे महत्त्वपूर्ण है छ्ठा पत्र जो संभवतः सम्मेलन के ठीक बाद लिखा गया था। नई ज़िम्मेदारी के अहसास से भरे प्रेमचंद ने इस पत्र मे साहित्यिक गतिविधियों के लिए भी पूरा वक्ती कार्यकर्ता की जरूरत को प्रेमचंद ने रेखांकित किया था। संगठन निर्माण की दुश्वारीयों से झूझते हुए किन्तु लगातार नए लक्ष्य निर्धारित करते प्रेमचंद खुद को एक ‘बूढ़े जवान’ के रूप में पाते है। पूरा पत्र इस प्रकार है- 

डियर सज्जाद,

तुम्हारा खत मिला। मैं एक दिन के लिए ज़रा गोरखपुर चला गया था और वहां देर हो गयी। मैंने यहां एक ब्रांच (प्रगतिशील लेखक संघ) कायम करने की कोशिश की है। तुम उसके मुतल्लिक (प्रगतिशील आंदोलन संबंधी) जितना लिट्रेचर हो वो सब भेज दो, तो मैं यहां के लेखकों को एक दिन जमा करके बातचीत करूं, बनारस कदासतपरस्ती (रूडिवादिता) का अड्डा है और हमें मुखालफत का भी सामना करना पडे। लेकिन दो-चार भले आदमी तो मिल ही जाएंगे जो हमारे साथ सहयोग कर सकें। अगर मेरी स्पीच (लखनऊ प्रगतिशील लेखक संघ सम्मेलन भाषण) की एक उर्दु कापी भेज दो और उसका तर्जुमा अंग्रेजी में हो गया हो तो उसकी चंद कापियां और मेम्बरी के फार्म की चंद परतें और लखनऊ कांग्रेस की कार्रवाई की रिपोर्ट वगैरह तो मुझे यकीन है कि यहां शाखा खुल जाएगी।
फिर पटना भी जाऊंगा और वहां भी एक शाखा कायम करने की कोशिश करूंगा। आज बाबू संपूरनानन्द (संयुक्त प्रांत के तत्कालीन शिक्षा मंत्री) से इसी सिलसिले में कुछ बातें हुयीं। वो भी मुझी को आगे करना चाहते हैं। मैं भी चाहता था कि वो पेशकदमी करते,मगर शायद उन्हें मसरूफियतें बहोत हैं। बाबू जयप्रकाश नारायण से भी बातें हुयीं, उन्होंने प्रोगेसिव अदबी हफ्तेवार (साप्ताहिक) हिंदी में साया करने की सलाह दी जिसकी उन्होंने काफी जरूरत बतायी। जरूरत तो मैं भी समझता हूं, लेकिन सवाल पैसे का है। अगर हम कई शाखें हिन्दी वालों की कायम कर लें, तो मुम्किन है माहवार या हफ्तेवार अखबार चला सकें। अंग्रेजी अखबार का मसअला भी सामने है ही।
मैं समझता हूं कि हर बार एक जबान में एक प्रोग्रेसिव परचा चल सकता है। जरा मुसाइदी (लगन) की जरूरत है। मैं तो युं भी बुरी तरह फंसा हुआ हूं। फिक्रे-मआश (रोज़ी की फिक्र) भी करनी पडती है। फजूल का बहोत सा लिटरेरी काम भी करना पडता है। अगर हम में से कोई होल टाइम काम करने वाला निकल आए तो मरहला बडी आसानी से तय हो जाए। तुम्हे भी कानून ने गिरफ्त कर रखा है……खैर इन हालात में जो कुछ मुम्किन है वही किया जा सकता है।


          तुम्हारा ‘बीमार’ (सज्जाद जहीर कृत एकांकी) तो मुझे अभी तक नहीं मिला। मिस्टर अहमद अली साहब क्या इलाहाबाद में हैं? उन्हें दो माह की छुट्टी है। वो अगर पहाड जाने की धुन में न हो, तो कई शहरों में दौरे कर सकते हैं और आगे के लिए उन्हें तैयार कर सकते हैं। बीमार अभी तक न भेजा हो,तो अब भेज दो।

यह खबर बहोत मसरर्तनाक (प्रसन्नता) है कि बंगाल और महाराष्ट्र में कुछ लोग तैयार हैं। हां यहां सूबेजाती (प्रांतीय) कांफ्रेंसें हो जाए तो अच्छा ही है और अगला जलसा पूजा में ही होना चाहिए,क्योंकि दूसरे मौके पर राइटरों का पहुंचना मुश्किल हो जाता है। फाकामस्ती की जमाअत जो ठहरी। वहां तो एक पंथ दो काज हो जाएगा।
हिन्दी वाले इन्फीरियटी काम्पलेक्स से मजबूर है। मगर गालेबन यह ख्याल तो नहीं है कि यह तहरीक उर्द वालों ने उन्हें फंसाने के लिए की है, अभी तक उनकी समझ में इसका मतलब ही न आया है। जब तक उन्हें जमा करके समझाया न जाएगा, युं ही तारीक़ी में पडे रहेंगे। एक नौजवान हिन्दी एडीटर ने जो देहली के एक सिनेमा अखबार का एडिटर है, हमारे जलसे पर यह एतराज किया है कि इस जलसे की सदारत (अध्यक्षता), तो किसी नौजवान को करनी चाहिए थी,प्रेमचंद जैसे बूढे आदमी इसके सद्र क्यों हुए ? उस अहमक को यह मालूम नहीं कि यहां वही जवान है जिसमें प्रोग्रेसिव रूह हो। जिसमें ऐसी रूह नहीं वो जवान होकर भी मुर्दा है।
नागपुर में मौलवी अब्दुल हक साहब भी तहरीक लाए थे उनसे दो रोज खूब बातें हुयीं। मौलाना इस सिनोसान में बडे जिंदादिल बुजुर्ग हैं।
क्या बताऊं मैं ज्यादा निकाल सकता, तो कानपुर क्या हर शहर में अपनी शाखें कायम कर देता। मगर यहां तो प्रूफ और खतूतनवीसी (खत लिखना) से फुरसत नहीं मिलती।
हां चोरी हुई (प्रेमचंद के घर में) मगर तशफ्फी (धैर्य) इस ख्याल से करने की कोशिश कर रहा हूं कि मुझे एक हजार रूपया अपने पास रखने का क्या हक़ था।


                                                                 मुखलिस
                                                                  प्रेमचंद 

उनके लिए नौजवान का मतलब ही था प्रगतिशील खयालात से युक्त व्यक्ति। अपनी मजबूरीयों और कमजोरियों के प्रति जैसा निर्मम रुख इस पत्र में उन्होने प्रकट किया है वह आज के तमाम लेखको के लिए भी प्रेरणा का विषय बन सकता है। अपनी तिल भर समस्या को ताड़ बना देने की प्रवृत्ति हिंदी  के लेखकों में खूब देखी जा सकती है।अपने से संघर्ष करके संगठन और सांस्कृतिक आंदोलन को किस दिशा में ले जाना है,  इसकी जद्दोजहद लगातार कम होती गई है। अब जबकि सत्ताएँ संस्कृतिकर्म की पहरेदारी दुबारा अपने हाथ में लेनी की तैयारी कर रही हैं, संगठित सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत पहले से ज्यादा हो गई है। क्या इस दिशा में हम प्रेमचंद से कुछ सीखने को तैयार हैं?